शास्त्रों में पांच प्रकार के ऋण

अंतिम ऋण चिता की लकड़ी…

क्या आप जानते हैं मृत्यु के बाद भी कुछ ऋण होते हैं जो मनुष्य का पीछा करते रहते हैं।

हिंदू धर्म शास्त्रों में पांच प्रकार के ऋण बताए गए हैं देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण, भूत ऋण और लोक ऋण।
इनमें से प्रथम चार ऋण तो मनुष्य के इस जन्म के कर्म के आधार पर अगले जन्म में पीछा करते हैं। इनमें से पांचवां ऋण यानी लोक ऋण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
प्रथम चारों ऋण तो मनुष्य पर जीवित अवस्था में चढ़ते हैं, जबकि लोक ऋण मृत्यु के पश्चात चढ़ता है।

जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसके दाह संस्कार में जो लकड़ियां उपयोग की जाती हैं दरअसल वही उस पर सबसे अंतिम ऋण होता है।
यह ऋण लेकर जब मनुष्य नए जन्म में पहुंचता है तो उसे प्रकृति से जुड़े अनेक प्रकार के कष्टों का भोग करना पड़ता है। उसे प्रकृति से पर्याप्त पोषण और संरक्षण नहीं मिलने से वह गंभीर रोगों का शिकार होता है।

मनुष्य की मृत्यु के बाद सुनाए जाने वाले गरूड़ पुराण में भी स्पष्ट कहा गया है कि जिस मनुष्य पर लोक ऋण बाकी रहता है उसकी अगले जन्म में मृत्यु भी प्रकृति जनित रोगों और प्राकृतिक आपदाओं, वाहन दुर्घटना में होती है। ऐसा मनुष्य जहरीले जीव-जंतुओं के काटे जाने से मारा जाता है।

कैसे उतारें ‘लोक-ऋण’

शास्त्रों में कहा गया है कि लोक ऋण उतारने का एकमात्र साधन है प्रकृति का संरक्षण। चूंकि मनुष्य पर अंतिम ऋण चिता की लकड़ी का होता है,
इसलिए अपने जीवनकाल में प्रत्येक मनुष्य को अपनी आयु की दशांश मात्रा में वृक्ष अनिवार्य रूप से लगाना चाहिए। कलयुग में मनुष्य की आयु सौ वर्ष मानी गई है।

इसका दशांश यानी 10 छायादार, फलदार पेड़ प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवनकाल में लगाना ही चाहिए।
हर हर महादेव
🙏

क्या ब्राह्मणों ने दर्शन विज्ञान या भाषा संस्कृति व्याकरण योग इत्यादि में योगदान दिया ?

इंग्लैंड का लगभग हर पादरी मिलिनेयर है । कुछ मल्टी मिलिनेयर भी हैं । हर एक । चर्च ऑव इंग्लैंड से जुड़े लगभग चार सौ व्यक्ति हाउस ऑव लार्ड्स में हैं । और पिछले पाँच सौ वर्षों से हैं । इंग्लैंड के गाँवों के सबसे बड़े और आलीशान घर , चर्च से जुड़े लोगों के हैं , आज भी हैं ।

क्या किसी पादरी ने बाईबिल पर कमेंट्री लिखी है आजतक ?
क्या किसी पादरी पिछले 2000 वर्षों में दर्शन या विज्ञान में कोई योगदान दिया ?
क्या पादरी का घर क्षतिग्रस्त हो जाए तो उसे धन की चिंता करनी पड़ती है? जी नहीं ।

भारत में 1947 के बाद स्वतंत्र भारत ने किस एक ब्राह्मण को उसके ब्राह्मण होने के गुण के कारण , राज्य सभा में भेंजा ? वे पाँच सौ वर्षों में 5000 से अधिक पादरियों को लॉर्ड बना चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट का जज । और आपने क्या किया , जो भिक्षा माँगकर वेदांत पढ़ाता था उसे भी अपराधी बना दिया क्योंकि भिक्षा माँगना अपराध हो गया ।

क्या भारत के सभी गाँवों में ब्राह्मणों के पास सबसे अधिक ज़मीन या उनका आलीशान बंगला है ?

क्या ब्राह्मणों ने दर्शन विज्ञान या भाषा संस्कृति व्याकरण योग इत्यादि में योगदान दिया ? आपको उत्तर पता है ।

1947 के पहले किसी प्रकार हमारे पूर्वज धर्म का प्रचार कर पा रहे थे पर 1947 के बाद , कृतघ्न राष्ट्र ने गौ वध को प्रतिबंधित नहीं किया । मनु स्मृति, छाप छाप कर जलाई । ब्राह्मण नामधारी धूर्तों को उपर उठाया गया । और आज जिसे वर्ण , कर्म और स्वभाव का तारतम्य भी नहीं पता है वह जात पात के नाम पर ब्राह्मणों को गरिया रहा है ।

वे पादरी , जिनको उनके दैनिक कुकर्म के लिए, पोप वार्षिक माफ़ी देता है वे आ रहे हैं जातिहीन समाज की रचना हेतु । अधिक से अधिक क्या होगा ? पोप , हर महीने उनको माफ़ कर देगा । आसमानी किताबें आपको मुबारक हों !

इंग्लैंड के लगभग सौ गाँवों में जा चुका हूँ और अन्य लोग होंगे इसी फ़ेसबुक पर जो की चाहें तों स्वंयम सत्यापित कर लें ..

उन सभी सौ गाँवों में लगभग एक तिहाई ज़मीन उस गाँव की चर्च के पास है । उस गाँव के सबसे प्रतिष्ठित और मंहगे घर ( आमतौर से दस करोड़ से उपर की वैल्यू के अर्थात् एक मीलियन पौंड से अधिक ) किसी विशप, प्रीस्ट या चर्च से जुड़े व्यक्ति का है ।

वे सभी घर भी तीन सौ चार सौ वर्ष पुराने तक के हैं ।

इंग्लैंड में चर्च ऑव इंग्लैंड से जुड़े सभी लोगों का न केवल समुदाय पर अधिकार है बल्कि संसाधनों पर भी ।

जैसे मान लीजिए एक गाँव में एक चर्च है और उसके रिपेयर की बिल एक करोड़ रूपए आती है और उस गाँव में तीन सौ घर हैं तो उस रिपेयर का खर्चा उन तीन सौ लोगों को उठाना पड़ेगा , चाहे आप चर्च जाते हों या न जाते हों , चाहे आप किताबी हों या एथिस्ट ।

उसी प्रकार मैं तुर्की और इजिप्ट के बारे में बता रहा हूँ वहाँ के सभी सुदूर गाँव वहाँ के इमाम , मौलवी और काजी के अधीन हैं । उनका उस क्षेत्र के सभी संसाधनों पर अधिकार है और वे ही क़ानून हैं ।

जैसे ग़ाज़ीपुर का अंसारी है , ठीक वही मॉडल किसी की चूँ करने की औक़ात नहीं है ।

19 वीं सदी में जो काम मैकाले ने किया , वहीं काम 1947 के बाद नेहरू ने किया की भारत में आर्थिक रूप से विपन्न परन्तु मेधा शक्ति से सम्पन्न ब्राह्मणों को सनातन धर्म से अलग कर दो । ब्राह्मण , सदियों से सनातन धर्म के उस इकोसिस्टम को क्षत्रियों वैश्यों और शूद्रों की सहायता से बचाए हुए थे जिसके बाहर आने पर या तो सदैव के लिए आसमानी किताब के गिरफ़्त में जाइए या वामपंथ के चंगुल में, पर नाश होना अवश्यमभावी है ।

रही बात धर्म की तो यह सच्चाई है की पिछले सत्तर वर्षों में हमने धर्म को रिलीजन और मज़हब का पर्याय बना दिया है । पर यह तय मान लें संख्या बल में कम रहकर भी हम उस दीपक को नहीं बुझने देंगे जो हमारे वैदिक ऋषियों ने प्रज्वलित करी है ।

किसी दिन आप लोगों को trust का रहस्य भी समझाऊँगा की कैसे चर्च ने फ़ाइनैन्सियल इन्स्टीट्यूशन पर क़ब्ज़ा किया हुआ है और उसका विकल्प क्या है ।
✍🏻राज शेखर

आइये आपको एक बड़ा सा झूठ सुनाते हैं | बरसों से सुनते आ रहे होंगे, एक बार फिर से मेरा दोहराना भी जरूरी है | आखिर समाज में मेरा भी तो योगदान बनता है !! वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म में होती है | इसाई में नहीं होती, मुस्लिम भी नहीं मानते, मतलब कुल मिला के ये पाप सिर्फ़ हम लोग ही करते है |

Knight in a shining armor सुना होगा शायद, तो भाई हर सिपाही Knight नहीं हो सकता था, उसके लिए पैदा होना पड़ता है एक ख़ास वंश में | अपनी वंशावली के दस्तावेज दिखाने पड़ते थे अगर किसी भी Tournament में हिस्सा लेना हो या युद्ध में सबसे आगे खड़ा होना हो तो | दस्तावेज कुछ वैसे ही होते थे जैसे आपने कभी गया, या बनारस, या फिर प्रयाग के ब्राम्हणों के वंशावली वाले दस्तावेज देखे होंगे |

इसके अलावा अमीर लोगों को, जमींदारों को Noble Man भी कहा जाता था, अगर आप सोच रहे हैं की अमीर होना एक मात्र शर्त थी Noble होने की तो आप फिर से गलत हैं | यहूदी कभी भी noble नहीं होता था, चाहे फिर वो King Richard को उधार / क़र्ज़ देता हो या फिर King William को इस से फ़र्क नहीं पड़ता | यहूदी अछूत और इसाई न्याय का हकदार नहीं होता था | अगर शक्स्पिअर की Merchant of Venice वाला Shylock याद हो तो आपको पता है की यहूदियों के साथ कैसा व्यवहार होता था | अगर कहीं Rebecca नाम सुना है और Walter Scott की लिखी Ivanhoe जैसी किताबें पढ़ी हैं तो आप अच्छे से जानते हैं की मैं क्या बात कर रहा हूँ |

कांग्रेस ने कई अलग अलग यूनिवर्सिटी / बोर्ड बनाये थे और ICSE या CBSE बोर्ड के छात्रों ने ये किताबें शायद पढ़ रखी होंगी |

अब जरा निचले स्तर पर आते हैं, Fool वैसा ही होता था जैसे भारतीय समाज में भांड होते हैं, नाचने गाने, दिल बहलाने वाले, थोड़े विदूषक जैसे | किसान होते थे, जिनके पास कभी अपनी ज़मीन नहीं होती थी | चरवाहा होता था भेंड़ पालने के लिए, यही छोटे सिपाही होते थे | Page वो बच्चे होते थे जिन्हें चिट्ठियां पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, बाद में इनमे से कुछ का promotion कर के उन्हें मंत्री भी बनाया जाता था | एक Squire होता था, ये knight के सहयोगी होते थे, knight नहीं बन पाते थे लेकिन सामान्य सिपाहियों से ज्यादा सम्मानित होते थे |

अभी भी शायद आप कहना चाहेंगे की इनपे धर्म की मुहर नहीं होती थी | ये एक सामाजिक व्यवस्था है जैसी बातें आपके मन में आ रही होंगी | तो आपको फ्रांस की Joan of Arc की कहानी देखनी चाहिए | ये महिला तलवार उठा कर स्वतंत्रता संग्राम में लड़ी थी और इसे चर्च ने सलीब पे टांग के जला दिया था | इनपर इल्ज़ाम था की वो डायन है, क्योंकि उनके छूते ही घाव ठीक हो जाते हैं | उस ज़माने में Witch Hunt की लम्बी प्रक्रिया चली थी | अभी हाल में चर्च ने इन हरकतों के लिए माफ़ी मांगी है | इनके बारे में मगर बात करना पाप है | स्त्रियों को इसाई धर्म में समानता का अधिकार है | वोट देने का अधिकार ज्यादातर इसाई मुल्कों में महिलाओं को भारत के बाद मिला ये अलग बात है |

धर्म की मुहर वैज्ञानिक खोजों पर भी लगी है, चार्ल्स डार्विन की क़िताब उनकी ही यूनिवर्सिटी में प्रतिबंधित थी और गलीलियो को घोड़ों से बाँध कर उसके चार टुकड़े कर दिए गए थे |

ध्यान रहे भारतीय धर्म पिछड़े हैं और पाश्चात्य प्रगतिशील !!!
✍🏻आनन्द कुमार

1 यूरोप मे 19 वीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व कभी भी कोई राष्ट्र राज्य नहीं थे ।
2 यूरोप के किसी भी राष्ट्र राज्य को साम्राज्य संचालन का कोई अनुभव 2000 वर्षों मे एक बार भी नहीं था । पहली बार 19 वीं शतब्दी ईस्वी मे ही इसका अनुभव हुआ । इसीलिए उनका कोई भी साम्राज्य 150 -200 वर्षों से अधिक टिका ही नहीं ।
3 भारत मे सैकड़ों साम्राज्य शताब्दियों से रहे हैं और एक एक कुल को 600 से 1000 वर्षों तक साम्राज्य संचालन का अनुभव रहा है ।
4 18 वीं शतब्दी के आरंभ मे इंग्लैंड 20 राज्यों मे बंटा था ।
5 बड़े राज्य पहली बार अंग्रेजों और अन्य यूरोपीय राज्यों ने भारत मे ही देखे । यूरोप के राज्य 18 वीं -19वीं शतब्दी मे स्वयम आपस मे वैज्ञानिक जानकारियों की चोरियाँ करते थे ,इस पर अनेक पुस्तकें हैं जिनमे अभिलेखीय साक्ष्य हैं । परस्पर कड़ाई से गोपनीयता बरतते थे ।
7 इसलिए उन्होने भारत से जो सीखा उसका उल्लेख नहीं किया क्योंकि ईसाइयत कृतज्ञता नहीं सिखाती ।
7 16 वीं शतब्दी ईस्वी मे सैकड़ों यूरोपीय लोग भारत के राजाओं के यहाँ सिपाही की नौकरी के लिए आए थे । वास्कोडिगामा जब भारत आय तो उसने देखा कि अलग अलग राजाओं के यहाँ सैकड़ों यूरोपीय सिपाही नौकरी कर रहे हैं और बहुत सुखी हैं । ये लोग यूरोप मे अपने अपने देश जाके यहाँ सीखी शस्त्र विद्या सिखाते थे ।
8 भारत से अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें ले जायी गईं । लूट के माल से साधन होने पर उन पर बड़ी मेहनत और तपस्या से कार्य हुआ । जर्मनी और इंग्लैंड फ़्रांस ने इन का खूब इस्तेमाल किया ।
9 ईसाइयों को भारत से मिली जानकारी के बाद बड़े राज्य की लिप्सा जागी । पहले उन्हे परस्पर खूनी लड़ाइयों का ही अभ्यास था , उनके मेधावी लोगों ने राज्य कौशल सीखा ।
10 भारत के नीचतम लोगों से ( यह इंग्लैंड की संसद के शब्द हैं ) ईस्ट इंडिया कंपनी ने छल कपट के साथ आपसी फूट का लाभ उठाना सीखा । उस से इंग्लैंड के लोग पहले घृणा करते थे पर जब यहाँ से खूब धन गया तो लोभ जागा । एडम स्मिथ ने The wealth of Nations पुस्तक लिखकर लूट को ईश्वरीय इच्छा बताया और उचित ठहराया । वह अर्थशास्त्र की मूल पुस्तक वहाँ हुयी ।
11 फिर भी उनके प्रबुद्ध लोगों ने भारत से बहुत कुछ सीखा और राज्यशास्त्र सीखा । इसीलिए 90 वर्ष टिके । जब भारतीयों ने उनका खेल समझा तो उखाड़ फेंका । इसमे सशस्त्र और शांतिपूर्ण दोनों मार्ग कुशलता से अपनाए गए ।
12 उन्होने शिक्षा का महत्व भारत से सीखा और फिर भारत की शिक्षा को जड़ मूल से नष्ट कर अपनी शिक्षा आरोपित की ।
13 इस से उन्हे बहुत लाभ हुआ । उनके अनेक शिष्य तैयार हुये । उनमे सबसे वफादार पर अपने सिर का भार अपनी शर्तों पर डाल कर वे गए ।
14 उनके शिष्यों मे सबसे होशियार और कुटिल जवाहर लाल नेहरू थे । उन्होने उनसे गद्दी तो ली पर फिर सोवियट संघ से सीख कर भयंकर आततायी तंत्र रचने की दिशा मे होशियारी से चले । इसीलिए वे मारे नहीं गए
15 उनकी चालाकी को पहचान कर सोवियट संघ ने अपने एजेंट यहाँ भर दिये ।
16 इस दुर्बल शासक समूह को देखकर यूरोप अमेरिका की अनेक शक्तियाँ यहाँ सक्रिय हो गईं ।
17 इस बीच भारतीयों का सबसे अनैतिक और चालाक वर्ग राजनीति मे छा गया और हर दल मे पैठ बना ली ।
18 शेष साधारण राजनैतिक कार्यकर्ताओं को भाव प्रधान बना कर रखा जाने लगा और उनसे शूद्रवत सेवा कार्य लिए जाने लगे और कुछ टुकड़े दिये जाने लगे ।

इसके लिए जिन छल रूपों का सहारा लिया गया , उनकी चर्चा आगे होगी ।

भारतीय इतिहास के विषय में यूरोपीयों को प्रमाण मानने की मूढ़ता:1

यूरोपियों को स्वयं अपने ही यूरोपीय अतीत का कोई भी प्रमाणिक ज्ञान नहीं है क्योंकि 19वीं सदी से पहले वहाँ इतिहास लेखन की कोई परंपरा नहीं रही है। सच तो यह है कि वहाँ विद्या की कोई प्राचीन परंपरा शेष है ही नहीं, जैसा प्रख्यात अध्येता प्रोफ़ेसर कुसुमलता केडिया जी ने बारंबार सप्रमाण कहा और बताया है…
अतः स्वयं यूरोप के प्राचीन इतिहास का कोई प्रामाणिक ज्ञान यूरोप में नहीं रहा है.
विश्व के अन्य भूभागों की तो उन्हें 19वीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व कोई गहरी और व्यापक जानकारी रही ही नहीं क्योंकि 16वीं शताब्दी ईस्वी से वह दुनिया में केवल इसी तरह खाने कमाने का साधन जुटाने अथवा मौका लगे तो लूटपाट करने के लिए ही निकले थे।
उस समय उन्हें न तो कोई जिज्ञासा थी और ना ही कोई उनमें अध्ययन की सामर्थ्य थी।
केवल यूरोप की कंगाली और भुखमरी तथा महामारी से बचकर दूर कहीं जाने और हो सके तो वहाँ से कुछ जोड़ या लूट कर अपने अपने इलाके में थोड़ा सम्मानित जीवन जीने की जुगाड़ करना ही उनके जीवन का उद्देश्य था और इसके लिए भी उन्हें अपने स्थानीय राजाओं को कमीशन देना होता था। जिसके प्रमाण भरे पड़े हैं।

भारतीय इतिहास के विषय में यूरोपीयों को प्रमाण मानने की मूर्खता:2

तथाकथित अध्ययन जो शुरू हुआ वह 19वीं शताब्दी में ही शुरू हुआ है। इसलिए विश्व के अतीत के इतिहास के विषय में कोई भी यूरोपीय विद्वान कुछ भी कहे तो वह अटकल पच्चू मात्र है क्योंकि वह उस विषय में अधिकारी है ही नहीं।
यूरोप के 15 सौ वर्षों का वे कुछ कुछ अनुमान लगाते हैं परंतु विश्व के विषय में अतीत का कोई भी ज्ञान कर पाना उनकी सामर्थ्य से बाहर की चीज है।
भारत में राजाओं के संपर्क में आने के बाद उन्हें अपने इस भीषण अज्ञान और इतिहास के अभाव का गहरा बोध हुआ क्योंकि यहाँ उन्होंने पाया कि इतिहास का विस्तृत ज्ञान भारत के लोगों को है।
तब उनमें से कुछ ने भारतीयों से पूछ पूछ कर यहाँ के राजाओं की कृपा पूर्ण अनुमति प्राप्त कर कुछ तथ्य जुटाने की मेहनत की क्योंकि न तो वे यहाँ की भाषा जानते थे और ना ही यहाँ के लोगों का उच्चारण पूरी तरह उन्हें समझ में आता था।
स्पष्ट है कि उन्होंने जो कुछ भी बहुत मेहनत के साथ संकलित किया वह आनुषंगिक और सेकेंडरी स्रोत है प्राथमिक नहीं। अतः जो कोई नव शिक्षित भारतीय, भारत के अतीत की यानी 16वीं शताब्दी ईस्वी से पहले की किसी भी घटना पर किसी यूरोपीय को उद्धृत करता है या उसके लिखे को आधार बनाता है तो इससे वह भारतीय स्वयं के विद्या विहीन होने का ही प्रमाण देता है।
वह अविचारणीय विषय पर समय नष्ट कर रहा होता है। क्योंकि यह तो ऐसा ही है जैसे आइन्स्टाइन के वैज्ञानिक ज्ञान पर नौवीं कक्षा का कोई भारतीय ग्रामीण छात्र कुछ लिखे और दावा करे कि सत्य यही है, ना कि उस विषय के शीर्ष वैज्ञानिकों के कथन सत्य हैं।
भारत के विषय में यूरोपीय लोगों के कथन ठीक इसी प्रकार के हैं जैसे शीर्ष विज्ञान के विषय में भारत के किसी गाँव का नौवीं कक्षा का विद्यार्थी कुछ कहे।
ज्ञान के निकष सार्वभौम होते हैं और भारत के लोगों को उस ज्ञान की सामर्थ्य से रहित मानकर चलना, जिस ज्ञान के वे लाखों बरसों से विशेषज्ञ हैं, और नौसिखुआ परदेशी को उसमे समर्थ मान लेना, यह ऐसा मानने वाले की बौद्धिक दयनीयता ही दर्शाता है।।
✍🏻प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

परंपरा से पैदा होती है रचनात्मकता

लेखक :- डॉ. जितेंद्र बजाज
( लेखक समाजनिति अध्ययन केन्द्र, चेन्नई के निदेशक हैं )

यह प्रश्न करना कि अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा पर हमें क्यों चर्चा करनी चाहिए, स्वयं में एक विलक्षण प्रश्न है। दुनिया में किसी भी देश में इस प्रकार का प्रश्न नहीं पूछा जाता। यूरोप में यदि आप किसी से पूछें कि ग्रीक और लैटिन पढऩा क्यों आवश्यक है, तो वह आप पर हँसेगा। यूरोप का कोई भी व्यक्ति ग्रीक और लैटिन न जाने, वह बड़ा विद्वान नहीं हो सकता। इसी प्रकार यदि आप अरब में भी यह प्रश्न पूछेंगे तो लोगों को विचित्र लगेगा। उन्हें भी अरबी, फारसी और अपने प्राचीन ज्ञान को जानना स्वाभाविक रूप से आवश्यक लगता है।
यदि हम आज की भाषा की ही बात करें तो किसी भी भाषा में तब तक कोई भी ऊँचा लेखन संभव नहीं है, जब तक आप उसके प्राचीन साहित्य को नहीं जान लेते। यदि आप भाषा की परंपरा को नहीं जानेंगे तो आपको भाषा आएगी ही नहीं। आपको न उपमाओं का पता चलेगा, न शब्दों का पता चलेगा। भाषा परंपरा से ही समृद्ध होती है। जब मैंने हिंदी में लिखना चाहा तो पहले आग्रहपूर्वक रामचरितमानस पढ़ा, फिर शब्दकल्पद्रुम को उपयोग किया। उसमें कोई शब्द किस पुराण या अन्यान्य ग्रंथ में आया है, उसका उल्लेख है। आज मैं जो हिंदी जानता हूँ तो इसमें इन दोनों ग्रंथों का योगदान है। आज यदि साहित्य में कुछ अच्छा दिखता नहीं है, तो इसलिए कि हमारा अपनी प्राचीन साहित्य और उसकी परंपरा के साथ संबंध-विच्छेद हुआ है। विश्व का कोई भी महान साहित्य परंपरा से कट कर नहीं लिखा गया।
जिस प्रकार साहित्य में बिना परंपरा को जाने कुछ अच्छा और महान रचना नहीं की जा सकती, ठीक इसी प्रकार ज्ञान-विज्ञान की कोई भी शाखा को उसकी परंपरा को जाने आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। उदाहरण के लिये यदि भारत में मेडिकल की पढ़ाई करने वालों का आयुर्वेद के साथ संपर्क रहा होता तो उनके काम में रचनात्मकता आ जाती। अभी केवल नकल दिखती है। यदि आप अपनी परंपरा के साथ जुड़ते हैं तो बड़ी रचनात्मकता आती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप वही करेंगे जो परंपरा में होता रहा है, बल्कि आप नया करेंगे और उसमें आप रचनात्मक होंगे।
यदि आप मेडिसिन की 1940 के आसपास की कोई पुस्तक उठा लें। उस समय तक एंटीबॉयोटिक नहीं थे, उनका आविष्कार द्वितीय महायुद्ध के बाद हुआ था, विटामिनों का अभी पता ही चला था, सर्जरी अधिक होती नहीं थी, क्योंकि एंटिबॉयोटिक नहीं थे। ऐसे में उनके उस समय की मेडिसिन की पुस्तकें किस पर आधारित थीं? वे आधारित थीं उनके ग्रीक पुस्तकों पर। हिप्पोक्रेटस और उसकी परंपरा में जो कुछ था, उसके आधार पर ही था। सबकुछ परंपरा में ही होता है। उसके बाहर तो कुछ होता ही नहीं है।
इसी प्रकार यदि हमें आज की समस्याओं को समझना चाहें तो इसके लिए भी अपनी ज्ञान परंपरा की जानकारी होनी चाहिए। अन्य लोगों को इसकी समझ भी नहीं आएगी। 1990 के आसपास हम भारत और विश्व में प्रतिव्यक्ति अनाज उत्पादन के आंकड़े एकत्र कर रहे थे। उस समय हमें आंकड़ों से यह पता चला कि प्रतिव्यक्ति उत्पादन और खपत के अनुपात की दृष्टि से भारत विश्व के अंतिम देशों में से है। इसका अर्थ यही है कि भारत में व्यापक स्तर पर भूखमरी है। हमने इस पर सभी से चर्चा की। योजना आयोग वालों से कहा तो उनका उत्तर होता था कि हमारी सभ्यता काफी पुरानी है और इतने वर्षों से खेती करने के कारण यहाँ की भूमि थक गई है और इसलिए यहाँ और उत्पादन नहीं बढ़ सकता। उनके मन में यही था कि इससे अधिक उत्पादन नहीं हो सकता। उस समय हमने सोचा कि इस विषय में भारत के प्राचीन साहित्य में क्या कहा गया है, इसे देखते हैं। उस समय मैंने उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत आदि को पढ़ा। उनमें किए गए वर्णन के आधार पर हमने पुस्तक लिखी अन्नं बहु कुर्वीत। उसे पढऩे से ऐसा लगता है कि उन ग्रंथों में यह सारी चर्चा इसी समस्या को लेकर की गई है।
यह ठीक है कि उन ग्रंथों में यह सारी इसी समस्या को लेकर नहीं है, लेकिन उस समय यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है कि धर्मसम्मत समाज का यह कर्तव्य है कि वह अपने आसपास के लोगों का इतना ध्यान रखें कि उनमें से कोई भूखा न रहे। केवल सभी मनुष्यों का ही नहीं, बल्कि सभी जीवों का भी ध्यान रखें। यह ध्यान रखने के बाद ही आप धर्मसम्मत भोजन कर सकते हैं। यह हमारी परंपरा में है। परंतु यदि हम अपनी परंपरा को नहीं जानते हैं, तो हम योजना आयोग के लोगों की तरह ही सोच पाएंगे कि हमारे लोगों की आर्थिक क्षमता इतनी नहीं है कि वे अपना भोजन जुटा सकें। अपनी परंपरा को जानने वाले यह तर्क दे ही नहीं सकते। इसलिए परंपरा का तो प्रत्येक समस्या से संबंध है। अपनी परंपरा को जाने बिना अपनी समस्या का जो भी समाधान हम निकालेंगे, वे गलत समाधान होंगे।
परंपरा का संबंध हमारे विदेश राजनय से भी है। यदि आपको मालूम ही नहीं है कि आपका देश क्या रहा है, आपकी सभ्यता क्या रही है तो आप क्या राजनय निभाएंगे? दुनिया के लोग तो अपनी परंपरा से ही राजनय सीखते हैं। ग्रीक साहित्य में कैसे किसी समस्या को देखा गया, अन्य देशों के साथ कैसे संबंध बनाए गए, इससे लोग सीखते हैं। चीन भी अपनी परंपरा से सीखता है, जापान भी सीखता है। केवल हम ही नहीं सीखते। यहाँ तक कि ईरान जैसे देश में अभी कुछ दिनों पहले वहाँ के विदेश मंत्री का एक वक्तव्य था। उसने कहा था कि अमेरिका को उसे कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं है। वे कोई आज के देश नहीं हैं। उनकी सभ्यता इन बहुत सारे देशों से कहीं अधिक पुरानी है। वे जानते हैं कि विश्व मे क्या होता है। वे लड़े भी हैं, हारे भी हैं। फिर भी वे उठे हैं। इसलिए उन्हें अमेरिका से सीखने की आवश्यकता नहीं है।
हमारे राजदूत इस विश्वास के साथ कुछ कह सकते हैं क्या? क्या वे कह सकते हैं कि हमने महाभारत पढ़ा है और हमें पता है कि राजनीति क्या होती है? भारत में रामायण और महाभारत पढ़े बिना क्या आप दुनिया से संबंध बनाएंगे? किस प्रकार की चर्चा आप कर पाएंगे।

भारतीय ज्ञान परंपरा की उद्गाता ‘वैदिक संपत्ति’

भारत पर सभ्यतागत आक्रमणों में एक बडा आक्रमण यहां की ज्ञान परंपरा पर किया गया था। भारतीय ज्ञान परंपरा का सबसे बडा आधार थे वेद और इसलिए अंग्रेजों सहित समस्त यूरोपीय बौद्धिक जगत ने वेदों को निरर्थक साबित करने के लिए एडी-चोटी एक कर दिया था। सबसे पहले कहा गया कि वेद तो चरवाहे और गरेडिये आर्यों के लिखे गीत मात्रा हैं, इनमें किसी प्रकार का कोई दर्शन या विज्ञान नहीं है। फिर वेदों के व्यर्थता को साबित करने के लिए इनका अनर्गल भाष्य करने और वैदिक साहित्य को हीनतर साबित करने के लिए वैदिक साहित्य पर विभिन्न प्रकार के आरोप लगाने जैसे प्रयास भी किए गए। वेदों में वर्णित प्रकृति के रहस्यों पर आधारित आलंकारिक कथाओं को मनुष्य इतिहास के रूप में दिखाने और उसके आधार पर वेदों में अश्लीलता, चरित्राहीनता और अनर्गल प्रलापों के भरे होने के दावे किए गए। स्वाभाविक ही था कि वेदों को परम प्रमाण मानने और उन पर गहरी आस्था रखने वाले वैदिक सनातन समाज पर यह एक गंभीर सभ्यतागत आक्रमण था। इस आक्रमण का वैदिक समाज ने जोरदार सामना किया और इन सभी आरोपों के खंडन और वेदज्ञान की श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए विपुल साहित्य की रचना की। ऐसी ही एक पुस्तक है वैदिक संपत्ति।
वैदिक संपत्ति के लेखक हैं पंडित रघुनंदन शर्मा और यह पुस्तक आज से 84 वर्ष पहले 1932 में लिखी गई, परंतु इसकी विशेषता यह है कि इसमें जो बातें लिखी और कही गई हैं, वे सभी आज भी उतनी ही प्रासंगिक और उतनी ही प्रामाणिक हैं। वेदों पर लगाए गए आक्षेपों का उत्तर देने के क्रम में लेखक ने आधुनिक विज्ञान से लेकर इतिहासकारों तक पर जो प्रश्न उठाए हैं, वे भी आज तक उतने ही महत्वपूर्ण बने हुए हैं और अनुत्तरित भी हैं। वैदिक संपत्ति पुस्तक एक अनूठी पुस्तक है जिसमें काफी सारे विषयों पर बडी ही प्रामाणिक, अधिकृत और शोधपरक जानकारी दी गई है। इसकी विषय सूची को यदि हम पढें तो पाएंगे कि विषय इतने अधिक विविधतापूर्ण हैं कि किसी एक लेखक द्वारा इतने सारे विषयों पर इतने अधिकारपूर्वक लिखना असंभव सा प्रतीत होता है। परंतु पंडित रघुनंदन शर्मा ने इस असंभव से कार्य को संभव कर दिखाया है। इतिहास से लेकर भाषाविज्ञान तक, भूगोल से लेकर नृतत्वविज्ञान तक, राजनीतिशास्त्रा से लेकर समाजशास्त्रा तक, ज्योतिष से लेकर जीवविज्ञान तक इतने सारे शास्त्रों, विषयों और विज्ञानों पर इतने अधिकारपूर्वक इतना प्रामाणिक लिखा गया है अविश्वसनीय सा प्रतीत होता है, और लेखक के प्रति स्वाभाविक श्रद्धा जाग उठती है।
वेदों के बारे में यूरोपीयों के दुष्प्रचार का आज यह परिणाम हुआ है कि अधिकांश भारतीय विद्वान भी वेदों में मानव इतिहास को स्वीकार करने लगे हैं। स्थिति यह है कि प्राचीन भारत के इतिहास को लिखने वाला हर छोटा-बडा इतिहासकार वेदों को उद्धृत करता ही है। उसमें वर्णित नामों और मानवीय एवं खगोलीय घटनाओं को भारत के इतिहास से जोडता ही है। परंतु यदि भारत के ऋषियों की मान्यता देखें तो वेदों में इतिहास संभव ही नहीं है। भारतीय मान्यता स्पष्ट है कि वेद ईश्वर द्वारा सृष्टि के आरंभ में प्रकाशित किए गए हैं। ऐसे में उसमें बाद का इतिहास कैसे हो सकता है? प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा है, तो फिर वेदों में आए नदियों, राजाओं, नगरों आदि नामों का क्या तात्पर्य है? पंडित रघुनंदन शर्मा ने पुस्तक के प्रारंभ में ही इस बात को साफ किया है और एक-एक नाम पर चर्चा की है। यह विवेचन काफी सरल और समझ में आने वाला है। इस अध्याय को पढने से वेदों में मानव इतिहास के होने के भ्रम का पूरी तरह निवारण हो जाता है।
वेदों की रचना और रचनाकाल को लेकर भी देश में काफी भ्रम है। आज का कोई भी व्यक्ति जो स्वयं को वैज्ञानिक सोच का मानता है, उसे वेदों की प्राकट्य सृष्टि के प्रारंभ में हुए होने की बात काल्पनिक और अविश्वसनीय लगती है। विशेषकर जबसे दुनिया में विकासवाद की परिकल्पना का प्रचार-प्रसार हुआ है, भारतीय शास्त्रों के विद्वान भी इसकी चपेट में आकर सनातन शास्त्रों की व्याख्या तदनुसार ही करने लगे हैं। उदाहरण के लिए कुछ लोग पुराणों में वर्णित अवतारों को विकासवाद की स्थापना के रूप में साबित करने का प्रयास करते हैं। परंतु विकासवाद की अवधारणा न केवल भारतीय स्थापना के विरूद्ध है, बल्कि वैज्ञानिक रूप से स्थापित भी नहीं है।
वेदों की प्राचीनता के अध्याय में पंडित रघुनंदन शर्मा ने बडी गहनता से विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विश्लेषण करते हुए विकासवाद पर जो प्रश्नचिह्न लगाए हैं, उनका उत्तर आज 84 वर्ष बाद भी विज्ञान के पास नहीं है।
वैदिक संपत्ति में आर्य आक्रमण सिद्धांत के उलट प्रारंभिक मनुष्यों यानी कि वैदिक भारतीयों के विदेशगमन के सिद्धांत को स्थापित किया गया है। लेखक की स्थापना है कि प्राचीन त्रिवष्टप या आज के तिब्बत के आस-पास मानव सृष्टि हुई और उसके बाद वहां से वे पूरी दुनिया में फैले। सुदूर इलाकों में लोग गए तो उनके रंग-रूप में परिवर्तन हुआ। इसके वर्णन में लेखक ने पूरी नृतत्वविज्ञान समझा दिया है।
भारत से बाहर गए विभिन्न कालखंडों में लोग कालांतर में वापस भी आए। ऐसे जिन विदेशी दलों का भारत में आगमन हुआ और उनका भारत पर जो प्रभाव पडा, उसकी भी गहन पडताल की गई है। यह अध्याय तो एकदम आँखें खोल देने वाला है क्योंकि आर्य बाहर से नहीं आए, यह कहते-कहते हम इसे भी उपेक्षित कर देते हैं कि भले ही आर्य कोई जाति नहीं थी और ऐसे कोई लोग बाहर से नहीं आए थे, परंतु वैदिक आर्यों की इस मूल बसावट में भी फिर भी विदेशी दलों का मिलान तो हुआ ही है। उनके कारण वैदिक साहित्य में कुछ गडबडियां भी हुई हैं। वैदिक साहित्य में हुई गडबडियों की चर्चा में भी रघुनंदन शर्मा ने स्तब्ध कर देने वाली जानकारियां दी हैं।
संहिताओं से लेकर उपनिषदों और ब्राह्मण ग्रंथों तक जो छेडछाड हुई है, उसे जानने के लिए वैदिक संपत्ति का यह अध्याय काफी उपयोगी है। आमतौर पर लोग महाभारत और पुराणों में ही गडबडियों को देखते हैं, परंतु छांदोग्य जैसे उपनिषद में भी कुछ छेडछाड हो सकती है, यह इसे पढे बिना समझना कठिन है। इसी क्रम में लेखक ने सती प्रथा के होने का भी सप्रमाण खंडन किया है। एकाध किसी घटना के आधार पर किस प्रकार एक प्रथा का बवंडर खडा किया गया और सनातन समाज को बदनाम किया गया, इसका जबरदस्त वर्णन किया गया है। इसे पढने से राजा राममोहन राय के काम पर बडा प्रश्नचिह्न लग जाता है।
वैदिक संपत्ति में लेखक ने वेदों के ज्ञान का विशद वर्णन किया है। वेदों में वर्णित समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था सहित अन्यान्य विषयों का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है। इसे पढने से वेदों का एक निर्भ्रांत और साफ चित्रा व्यक्ति के मन में उभरता है, अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा जागती है और भारत की सनातनता का विश्वास दृढ होता है। यह पुस्तक भारत के प्राचीन ज्ञान की एक जबरदस्त कुंजी है। यह भारतीय ज्ञान और वैदिक साहित्य पर लगाए गए समस्त आक्षेपों का निराकरण कर उनके सटीक उत्तर प्रस्तुत करती है और जो सवाल यह खडे करती है, आधुनिक विज्ञान उनपर आज भी निरूत्तर है।
यह पुस्तक गोविंदराम हासानंद, 4408, नई सड़क, दिल्ली 110006 से प्राप्त की जा सकती है।
✍🏻साभार – भारतीय धरोहर

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– the free coaching program Sood Charity Foundation in collaboration with Divine India Youth Association (DIYA), Delhi chapter presents SAMBHAVAM – a unique initiative to provide free IAS coaching, mentorship support and personality development courses to the deserving candidates. IAS SCHOLARSHIP TERMS & CONDITIONS – 1. Submission of your entry / form does not guarantee scholarship to the requestee under this campaign. 2. At no point in time can any claim be made in any aspect on SCF, DIYA Delhi and its Board Members. 3. SAMBHAVAM team holds the right to withdraw Scholarship at any time, from students they find non-serious or involved in any activities which are unwarranted and against the basic ethics of our scholarship program. 4. No correspondence will be entertained or guaranteed to non-selected students. 5. Decision of the Sambhavam team, SCF & DIYA Delhi will be final and binding on any / all aspects of the scholarship program. 6. All disputes, if any, will be subject matter jurisdiction in Mumbai courts. Instructions – 1. Candidates can fill the form either in Hindi or English. 2. Candidates will be selected based on merit, vulnerability and financial criteria. 3. If at any point the credentials of the students are found to be incorrect, the SAMBHAVAM team reserves the right to reject the application of the candidates. Declaration by candidate – I have carefully read the instructions and agree to abide by the SAMBHAVAM team’s decision regarding my selection for the program. I certify that the particulars given by me in this form are true to the best of my knowledge and belief. I am aware, that, in case, I have given incorrect/ false information, then my admission will be withdrawn at any stage. * Required Name * Your answer Email ID * Your answer Mobile No. (without country code) * Your answer WhatsApp No. (without country code) Your answer Gender * Male Female Other: What’s your Permanent Address ? * Your answer Which type of region do you belong to ? * Rural Urban Town (Semi Urban) What’s your Current Address ? * Your answer What is your annual parental income (from all sources) ? * (Based on income certificate issued by a competent authority) Your answer Do you belong to Persons with Disabilities (PwD) category as per RPwD Act 2016 ? * Yes No What is your current profile ? * Student Working professional Business / Self Employed Other: What’s your academic qualification ? * Intermediate / 12th Standard Graduation in progress Graduate Post Graduation in progress Post Graduate Research Scholar Other: Name of the last college that you have attended or currently attending ? * (Eg. – IIT Kanpur, Uttar Pradesh) Your answer Name of the last course that you have completed or currently pursuing ? * (Eg. – B.Tech. – Computer Science) Your answer What’s your High School (10th Class) percentage or CGPA ? * Your answer Name of your High School Board ? * CBSE ICSE Other: What’s your Intermediate(12th Class) percentage or CGPA ? * Your answer Name of your Intermediate Class Board ? * CBSE ISC Other: What’s your Graduation Percentage or CGPA ? * Your answer Do you have any other higher qualification or Professional degree ? (Give details along with the percentage/CGPA) Your answer In which medium have you planned to appear for Civil Services Exam ? * Hindi English Other: Which optional subject have you chosen for Civil Services Exam ? * Geography Political Science Sociology Public Administration Hindi Literature Not decided yet Other: Have you qualified any stage of UPSC Civil Services or State Civil Services Exam earlier ? * Yes, cleared PRELIMS of UPSC Civil Services Yes, cleared MAINS of UPSC Civil Services Yes, cleared PRELIMS of State Civil Services Yes, cleared MAINS of State Civil Services Not cleared any of these Other: Have you taken or currently taking any coaching for Civil Services ? * Yes No Which mode of coaching are you comfortable with ? * Online Offline (in Delhi) Both Online and Offline Give details about your achievements, awards received or position of responsibility (School/College level), if any. Also give a brief description of your hobbies / extra curricular activities / interests ? * Your answer Why do you feel that you are the most deserving candidate for this scholarship ? * Your answer How did you come to know about this initiative ? * Friends Media Website Whatsapp Facebook Telegram Other: Any queries / comments / suggestions ? Your answer Submit Never submit passwords through Google Forms. This content is neither created nor endorsed by Google. Report Abuse – Terms of Service – Privacy Policy  Forms

Bill & Melinda Gates Foundation

US K-12 School Finance Request for ProposalsOpens May 19 2021 12:01 PM (PDT)Deadline Jun 10 2021 08:59 PM (PDT)$1.00 to $115,000.00Description

Policymakers need evidence and analysis to improve school funding systems, but relevant research is rarely available in the right format to inform decision-making. As a result, many education funding discussions are often dominated by ideology and precedence rather than rigorous research.

The Bill and Melinda Gates Foundation seeks to increase the use of research in education policymaking in the United States by empowering researchers to publish timely, rigorous analyses in a format that is useful and engaging for state policymakers and advocates. Our goal is to bring more data-driven voices into the school funding conversation and to broaden and diversify the pool of scholars that do this kind of work.

As such, we are seeking proposals from education policy researchers and analysts to complete short, relevant analyses of education funding policy issues. 

Audience. This opportunity is open to all policy researchers, analysts and organizations with an interest in education and the ability to analyze topics of interest in school funding.

Types of analyses. A broad range of potential analyses would be suitable for this opportunity. Examples include descriptive analyses documenting a policy issue in a systematic way and analyses of the likely impacts of isolated state or local policies on school funding and student and community outcomes.

All topics, spanning K–12 education funding in the United States, are eligible. We are especially interested in analyses focused on racial equity and policies of public interest, including issues related to revenue and state funding for schools. Some examples include:

  • Funding models: Are some funding models more advantageous in terms of ensuring equity and smoothing out wealth disparities among school districts?
  • State influence: Is there a discernable relationship between the structure of state funding models and district spending behavior? Has district spending behavior changed with large-scale funding formula overhauls?
  • Tax effort: What is the current commitment of education spending within state budgets as a proportion of a state’s wealth? What policy implications can be derived from contrasting wealth and tax effort across states?
  • Revenue volatility: School districts depend on several disparate taxes, some more volatile than others. Is there a longitudinal effect on equity in funding that can be identified by isolating revenue types?
  • State vs. local funding: Are there determined trends in school funding that can be linked to the state’s dependence on local revenues for funding? What are the implications for student, community, political and/or civic outcomes?

Selected Work Products. Authors will own their work, while providing a license to the Bill and Melinda Gates Foundation to publish and disseminate the work. Authors will be encouraged to further develop their analyses for publication in other outlets (e.g., academic journals).

Proposal Process. Proposals should be no more than 750 words and should include a description of the topic, an explanation of why it’s important, the dataset(s) that will be used, the analyses that will be conducted, and the implications for education funding policy.

Proposals can be submitted through an application portal located at 

https://submit.gatesfoundation.org/prog/school_finance_rfp1

Proposals will be reviewed on a rolling basis, with a final deadline of June 10, 2021. Review criteria include the proposal’s originality, feasibility, and relevance. Selected authors can expect a response to their proposal by July 1, 2021.

Authors are welcome to submit multiple proposals.

Project Budget. Applications should include a short line-item budget for this work. Funding for each project is capped at $115,000, which includes a maximum indirect cost rate of 15%. 

Acceptance Process. Once proposals are accepted, applicants will complete required foundation proposal documents, which include a detailed scope of work and budget. Payments will be made in two phases – half of the project budget will be advanced, and half paid upon completion of work.  

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A Blueprint for Better Learning

Contractors Adapt to Changing K-12 Facility Needs

By Hilary Daninhirsch | Saturday, August 31, 2019Safety , Markets , Schools , Institutional , Sustainability , innovation

Blueprints for K-12 school construction reflect radical changes in the educational landscape. Yesterday’s linear hallways and windowless classrooms are being replaced with open, collaborative learning spaces purposefully designed to accommodate small group interactions and project-based learning.

Although kids are still kids, and students are still students, the world in which they are growing up has shifted monumentally. For teachers to connect with students and for students to connect with their worlds, 21st century school designs must keep up.

Also trending in school design is a significant emphasis on energy efficiency and building materials, as well as stringent safeguards in security.

BLENDING THE OLD WITH THE NEW

The Natrona County High School in Casper, Wyoming, was originally built in 1921. When the school district began thinking about a renovation in 2004, it wanted to maintain the historic integrity of the building while accommodating the needs of its 1,800 students. 

“We are seeing more additions and renovations rather than completely new buildings when it’s possible, and repurposing the way buildings are being used,” says Tom Stone, vice president of project procurement with Adolfson & Peterson Construction’s Denver office, who supervised the six-phase renovation.

This can be a very delicate balancing act. For the Casper project, the firm was charged with painstakingly restoring stained glass windows in the old theater, re-ballasting historic light fixtures, cleaning and re-patching original terracotta on the exterior, and taking special care of other time-honored elements. It also had to build a swing space—a temporary area for the students to hold classes while the renovation project was in progress—which now has a second life as the Student Fitness and Activity Center. 

Ultimately, the project team renovated and restored 135,000 square feet of the original building and added 200,000 square feet to an adjacent building.
From conception to completion, the massive project took 14 years and earned the company a first-place Excellence in Construction® (EIC) Award from Associated Builders and Contractors. 

COOPERATIVE LEARNING MODELS

New educational learning models are driving the trends in school design today. 

“Probably the most noticeable and significant trend in design is building space for collaboration,” says John Marshall, vice president of Satterfield & Pontikes Construction, a first-place ABC EIC Award winner for its role as the general contractor to build the new Klein Cain High School on the outskirts of Houston. This massive 675,000-square-foot school accommodates up to 3,500 students and provides an extensive range of advanced resources and facilities, from core curriculum classrooms to technical education spaces.

A collaborative learning model is giving rise to spaces where students can work together. “Rather than narrow hallways with low ceilings and classrooms lined up on each side, you’ll see higher ceilings, more open spaces, more light, and in some areas you’ll have nooks,” Marshall says.

Many projects also incorporate “learning stairs”: a place for students to gather off the main hallway. Others include operable partitions, so it’s easy to break into either smaller rooms or more quiet spaces. 

“You don’t have that same hard-and-fast design of hallways running down a spine and classrooms on either side, with desks set the same way. It’s been a real effort to encourage and enable learning in a way that students learn today,” he adds.

Across the country, more resources are being dedicated to career and technical education at the high school level, resulting in construction of spaces such as auto and culinary shops or cosmetology labs.

Stone agrees that construction of collaborative learning spaces, learning pods and shared gathering spaces is becoming more common.  

In addition to an open classroom layout, the Natrona County High School offers students a courtyard and a multistory common area. “It’s got soft seating, places to gather and a large, open, cohabitated space with many functions going on at the same time; that is a big trend when it comes to school design and construction,” Stone says.

SCHOOL SECURITY

The new reality is that security in K-12 schools is a critical component of school design, and it’s at the top of educators’ minds.

“That is probably, start to finish, the most significant part of a project: ensuring and maintaining the safety of the school. If you’re working on an occupied school, you have a whole different, and in some ways a greater, set of challenges,” Marshall says. 

Many school districts are installing security vestibules where visitors can be screened before they’re able to get anywhere else in the building, creating distinctly separate entrances for students and visitors, and ensuring good lines of sight from administrative areas.

“We’re eliminating exterior entry points in a controlled way—it is very centralized,” Stone says. “How you get in and how you access and enter the building is very purposeful.”

Security extends to the construction site as well, with workers being scrutinized and vetted a lot more closely than they used to be, especially during renovation projects.

“Existing school sites’ modernization work is seeing an increase in enforcement of security and restricted access, and pre-approved criminal background checks,” says Ron Hicks, vice president and co-owner of Soltek Pacific, an ABC Accredited Quality Contractor firm headquartered in San Diego. “New construction has adopted completely new standards for door hardware to provide additional security during lockdown mode.”

SUSTAINABILTY MATTERS

Energy efficiency also is on many school districts’ radars, with educators advocating for the positive impacts of air quality and natural light on students’ learning.

“We’re seeing a lot more sustainable thoughts, ideas and design implementation, and more options for energy conservation,” Stone observes. Especially in the West and South, school decision-makers are seeking construction of geothermal systems and installation of solar panels to take advantage of local energy-sharing exchanges. 

However, LEED is falling out of favor for some developers and planners in the K-12 marketplace.

“While you may not get a lot of educational facilities that do seek the [LEED] certification, you see the associated benefits that come from greater energy efficiency and environmentally friendly design,” Marshall says. Indeed, at Klein Cain High School, the building’s air quality is as clean as it can be, while the abundance of windows allows natural light to stream in.

The emphasis on LEED and other certifications has reached a plateau in recent years due to the realization that the excessive costs of achieving certification is not always compensated by long-term savings in life cycle maintenance, Hicks explains.

Still, in San Diego, schools are incorporating more smart technology than ever before to achieve ultra-efficient, environmentally controlled heating, cooling and lighting. 

Schools are also seeking more sophisticated craftsmanship in everything from carpets and flooring tile to paint, hardware and fixtures. Metal mesh panel accents, specialty tiles, polished concrete and high-end wood finishes are growing in popularity.

DELIVERY METHODS AND CHALLENGES

Like the buildings themselves, construction delivery methods are evolving. 

California almost exclusively has migrated to a lease-leaseback delivery method; Hicks has found, however, that K-12 clients prefer this anyway, as the method creates a higher degree of collaboration and fewer conflicts. “School clients prefer to have the architect and contractor work together throughout the design process doing constructability review and budget maintenance to ensure minimal change orders due to design errors or conflicts during the construction phase,” he says.

While every delivery system has its benefits, the question becomes what works best for the district. For Klein Cain High School, Satterfield & Pontikes acted as the construction manager at-risk to provide preconstruction and construction services, and it incorporated BIM and 3D modeling that contributed to quality control.

“Using technology, we are able to, in a visual 3D model, show the impact of certain decisions and materials. This really helps the owner and the design team quickly get to what works best. We always advocate for more collaborative delivery and earlier involvement of the construction team,” Marshall says.

Stone likewise is seeing more collaboration. “Most projects are done in a negotiated way; whether it’s design-build or construction manager/general contractor, we’re seeing more of those methods than the traditional bid deliveries.”

Teamwork becomes even more essential when contractors are contending with occupied buildings, scheduling logistics, weather delays and tight timelines, not to mention added background checks for workers. Plus, school construction often requires additional layers of plan check, review and approval by historical preservation groups and local/state architectural boards. 

ALL WORTH IT

Despite the headaches, bureaucracy and potential setbacks that can delay a K-12 construction project, those who work in the industry believe it is worthwhile in the long run. Hicks enjoys the “satisfaction of fulfilling a role and creating an environment for students and future leaders.”

Similarly, Stone adds, “I like the idea of the leading the charge: We have the opportunity to enhance kids’ lives and help them move forward.” 

Marshall, who is from a family of educators, says, “I am a big believer in education. I think it’s what makes us different as a country than anyone else in the world; knowing we’re contributing to that is really satisfying.” 

A Blueprint for Better Learning

Contractors Adapt to Changing K-12 Facility Needs By Hilary Daninhirsch | Saturday, August 31, 2019 Safety , Markets , Schools , Institutional , Sustainability , innovation Blueprints for K-12 school construction reflect radical changes in the educational landscape. Yesterday’s linear hallways and windowless classrooms are being replaced with open, collaborative learning spaces purposefully designed to accommodate small group interactions and project-based learning. Although kids are still kids, and students are still students, the world in which they are growing up has shifted monumentally. For teachers to connect with students and for students to connect with their worlds, 21st century school designs must keep up. Also trending in school design is a significant emphasis on energy efficiency and building materials, as well as stringent safeguards in security. BLENDING THE OLD WITH THE NEW The Natrona County High School in Casper, Wyoming, was originally built in 1921. When the school district began thinking about a renovation in 2004, it wanted to maintain the historic integrity of the building while accommodating the needs of its 1,800 students.  “We are seeing more additions and renovations rather than completely new buildings when it’s possible, and repurposing the way buildings are being used,” says Tom Stone, vice president of project procurement with Adolfson & Peterson Construction’s Denver office, who supervised the six-phase renovation. This can be a very delicate balancing act. For the Casper project, the firm was charged with painstakingly restoring stained glass windows in the old theater, re-ballasting historic light fixtures, cleaning and re-patching original terracotta on the exterior, and taking special care of other time-honored elements. It also had to build a swing space—a temporary area for the students to hold classes while the renovation project was in progress—which now has a second life as the Student Fitness and Activity Center.  Ultimately, the project team renovated and restored 135,000 square feet of the original building and added 200,000 square feet to an adjacent building. From conception to completion, the massive project took 14 years and earned the company a first-place Excellence in Construction® (EIC) Award from Associated Builders and Contractors.  COOPERATIVE LEARNING MODELS New educational learning models are driving the trends in school design today.  “Probably the most noticeable and significant trend in design is building space for collaboration,” says John Marshall, vice president of Satterfield & Pontikes Construction, a first-place ABC EIC Award winner for its role as the general contractor to build the new Klein Cain High School on the outskirts of Houston. This massive 675,000-square-foot school accommodates up to 3,500 students and provides an extensive range of advanced resources and facilities, from core curriculum classrooms to technical education spaces. A collaborative learning model is giving rise to spaces where students can work together. “Rather than narrow hallways with low ceilings and classrooms lined up on each side, you’ll see higher ceilings, more open spaces, more light, and in some areas you’ll have nooks,” Marshall says. Many projects also incorporate “learning stairs”: a place for students to gather off the main hallway. Others include operable partitions, so it’s easy to break into either smaller rooms or more quiet spaces.  “You don’t have that same hard-and-fast design of hallways running down a spine and classrooms on either side, with desks set the same way. It’s been a real effort to encourage and enable learning in a way that students learn today,” he adds. Across the country, more resources are being dedicated to career and technical education at the high school level, resulting in construction of spaces such as auto and culinary shops or cosmetology labs. Stone agrees that construction of collaborative learning spaces, learning pods and shared gathering spaces is becoming more common.   In addition to an open classroom layout, the Natrona County High School offers students a courtyard and a multistory common area. “It’s got soft seating, places to gather and a large, open, cohabitated space with many functions going on at the same time; that is a big trend when it comes to school design and construction,” Stone says. SCHOOL SECURITY The new reality is that security in K-12 schools is a critical component of school design, and it’s at the top of educators’ minds. “That is probably, start to finish, the most significant part of a project: ensuring and maintaining the safety of the school. If you’re working on an occupied school, you have a whole different, and in some ways a greater, set of challenges,” Marshall says.  Many school districts are installing security vestibules where visitors can be screened before they’re able to get anywhere else in the building, creating distinctly separate entrances for students and visitors, and ensuring good lines of sight from administrative areas. “We’re eliminating exterior entry points in a controlled way—it is very centralized,” Stone says. “How you get in and how you access and enter the building is very purposeful.” Security extends to the construction site as well, with workers being scrutinized and vetted a lot more closely than they used to be, especially during renovation projects. “Existing school sites’ modernization work is seeing an increase in enforcement of security and restricted access, and pre-approved criminal background checks,” says Ron Hicks, vice president and co-owner of Soltek Pacific, an ABC Accredited Quality Contractor firm headquartered in San Diego. “New construction has adopted completely new standards for door hardware to provide additional security during lockdown mode.” SUSTAINABILTY MATTERS Energy efficiency also is on many school districts’ radars, with educators advocating for the positive impacts of air quality and natural light on students’ learning. “We’re seeing a lot more sustainable thoughts, ideas and design implementation, and more options for energy conservation,” Stone observes. Especially in the West and South, school decision-makers are seeking construction of geothermal systems and installation of solar panels to take advantage of local energy-sharing exchanges.  However, LEED is falling out of favor for some developers and planners in the K-12 marketplace. “While you may not get a lot of educational facilities that do seek the [LEED] certification, you see the associated benefits that come from greater energy efficiency and environmentally friendly design,” Marshall says. Indeed, at Klein Cain High School, the building’s air quality is as clean as it can be, while the abundance of windows allows natural light to stream in. The emphasis on LEED and other certifications has reached a plateau in recent years due to the realization that the excessive costs of achieving certification is not always compensated by long-term savings in life cycle maintenance, Hicks explains. Still, in San Diego, schools are incorporating more smart technology than ever before to achieve ultra-efficient, environmentally controlled heating, cooling and lighting.  Schools are also seeking more sophisticated craftsmanship in everything from carpets and flooring tile to paint, hardware and fixtures. Metal mesh panel accents, specialty tiles, polished concrete and high-end wood finishes are growing in popularity. DELIVERY METHODS AND CHALLENGES Like the buildings themselves, construction delivery methods are evolving.  California almost exclusively has migrated to a lease-leaseback delivery method; Hicks has found, however, that K-12 clients prefer this anyway, as the method creates a higher degree of collaboration and fewer conflicts. “School clients prefer to have the architect and contractor work together throughout the design process doing constructability review and budget maintenance to ensure minimal change orders due to design errors or conflicts during the construction phase,” he says. While every delivery system has its benefits, the question becomes what works best for the district. For Klein Cain High School, Satterfield & Pontikes acted as the construction manager at-risk to provide preconstruction and construction services, and it incorporated BIM and 3D modeling that contributed to quality control. “Using technology, we are able to, in a visual 3D model, show the impact of certain decisions and materials. This really helps the owner and the design team quickly get to what works best. We always advocate for more collaborative delivery and earlier involvement of the construction team,” Marshall says. Stone likewise is seeing more collaboration. “Most projects are done in a negotiated way; whether it’s design-build or construction manager/general contractor, we’re seeing more of those methods than the traditional bid deliveries.” Teamwork becomes even more essential when contractors are contending with occupied buildings, scheduling logistics, weather delays and tight timelines, not to mention added background checks for workers. Plus, school construction often requires additional layers of plan check, review and approval by historical preservation groups and local/state architectural boards.  ALL WORTH IT Despite the headaches, bureaucracy and potential setbacks that can delay a K-12 construction project, those who work in the industry believe it is worthwhile in the long run. Hicks enjoys the “satisfaction of fulfilling a role and creating an environment for students and future leaders.” Similarly, Stone adds, “I like the idea of the leading the charge: We have the opportunity to enhance kids’ lives and help them move forward.”  Marshall, who is from a family of educators, says, “I am a big believer in education. I think it’s what makes us different as a country than anyone else in the world; knowing we’re contributing to that is really satisfying.” 

सुकन्या समृद्धि योजना 2021: Sukanya Samriddhi Yojana Online Form, आवेदन फॉर्म PDF

By Helpline Dept / April 13, 2021

Sukanya Samriddhi Yojana Online Form | सुकन्या समृद्धि योजना चार्ट PDF | सुकन्या समृद्धि योजना कैलकुलेटर इन हिंदी | SSY Application Form PDF | सुकन्या समृद्धि योजना इंटरेस्ट रेट 2021-22

सुकन्या समृद्धि योजना उन परिवारों के लिए एक छोटी बचत योजना है, जो अपनी बेटी की शादी के लिए कुछ बचत करना चाहते है। सुकन्या समृद्धि योजना के तहत, बालिकाओं के अभिभावक उनके लिए बचत खाता खोल सकते हैं। जब तक वह बालिका 10 वर्ष की नहीं हो जाती है। सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत आप SSY 2021 स्कीम को 250 रुपये की न्यूनतम जमा राशि के साथ शुरू कर सकते हैं। पहले यह राशि 1,000 रुपये थी। इस योजना के तहत चालू वित्त वर्ष के दौरान अधिकतम 1.5 लाख रुपये जमा किए जा सकते हैं।https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-2388891887823439&output=html&h=300&slotname=4742375703&adk=1168395554&adf=1968849653&pi=t.ma~as.4742375703&w=360&lmt=1624077862&rafmt=1&psa=0&format=360×300&url=https%3A%2F%2Fwww.readermaster.com%2Fsukanya-samriddhi-yojana%2F&flash=0&fwr=1&fwrattr=true&rpe=1&resp_fmts=3&sfro=1&wgl=1&dt=1624077857971&bpp=178&bdt=6236&idt=3398&shv=r20210616&cbv=%2Fr20190131&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&correlator=424019562744&frm=20&pv=2&ga_vid=588394312.1624077862&ga_sid=1624077862&ga_hid=115936355&ga_fc=0&u_tz=330&u_his=1&u_java=0&u_h=640&u_w=360&u_ah=640&u_aw=360&u_cd=24&u_nplug=0&u_nmime=0&adx=0&ady=739&biw=360&bih=562&scr_x=0&scr_y=0&eid=31060474&oid=3&pvsid=1105547877638207&pem=761&ref=android-app%3A%2F%2Fcom.google.android.googlequicksearchbox&eae=0&fc=640&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C360%2C0%2C360%2C562%2C1049%2C1637&vis=1&rsz=%7C%7CeEbr%7C&abl=CS&pfx=0&fu=1152&bc=31&ifi=1&uci=a!1&btvi=1&fsb=1&xpc=FeiERQWJ3o&p=https%3A//www.readermaster.com&dtd=4506

सुकन्या समृद्धि योजना के तहत आप अपनी बच्चियों के भविष्य को आसानी से सुरक्षित कर सकते है। कोई भी माता-पिता एवं अभिवावक किसी भी बालिका का 10 वर्ष की आयु से पूर्ण होने से पहले इस योजना के अन्तर्गत किसी भी मान्यता प्राप्त बैक एवं पोस्ट आफिस में बैंक अकाउंट खोल सकता हैं। इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको Sukanya Samriddhi Yojana 2021 के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान कर रहे है। जैसे योजना का लाभ कैसे उठाए, पात्रता, इंटरेस्ट रेट इत्यादि। कृपया इसके लिए पूरा लेख अंत तक पढ़ें।

SSY Sukanya Samriddhi Yojana PDF In Hindi
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सुकन्या समृद्धि योजना 2021 (SSY) क्या है?

Sukanya Samriddhi Yojana Details – जैसे की हमने ऊपर बताया कि सुकन्या समृद्धि योजना मोदी सरकार की एक प्रमुख योजना है। यह एक छोटी बचत योजना है, जिसे 22 जनवरी 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने शुरू किया था। इस योजना के तहत बालिकाओं के बचत खाते खोले जाते हैं। जिसमें 250 रुपये से लेकर 1.5 लाख रुपये तक की राशि जमा कर सकते है। इस Sukanya Samriddhi Yojana 2021-2022 के नये नियम नीचे दिए गए हैं:https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-2388891887823439&output=html&h=300&slotname=6498310509&adk=1353065304&adf=237171941&pi=t.ma~as.6498310509&w=360&lmt=1624077865&rafmt=1&psa=0&format=360×300&url=https%3A%2F%2Fwww.readermaster.com%2Fsukanya-samriddhi-yojana%2F&flash=0&fwr=1&fwrattr=true&rpe=1&resp_fmts=3&sfro=1&wgl=1&dt=1624077858503&bpp=21&bdt=6768&idt=6567&shv=r20210616&cbv=%2Fr20190131&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&prev_fmts=360×300&correlator=424019562744&frm=20&pv=1&ga_vid=588394312.1624077862&ga_sid=1624077862&ga_hid=115936355&ga_fc=0&u_tz=330&u_his=1&u_java=0&u_h=640&u_w=360&u_ah=640&u_aw=360&u_cd=24&u_nplug=0&u_nmime=0&adx=0&ady=2768&biw=360&bih=562&scr_x=0&scr_y=0&eid=31060474&oid=3&pvsid=1105547877638207&pem=761&ref=android-app%3A%2F%2Fcom.google.android.googlequicksearchbox&eae=0&fc=640&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C360%2C0%2C360%2C618%2C1049%2C1801&vis=1&rsz=%7C%7CeEbr%7C&abl=CS&pfx=0&cms=2&fu=1152&bc=31&ifi=2&uci=a!2&btvi=2&fsb=1&xpc=Ip9WWH9vio&p=https%3A//www.readermaster.com&dtd=7043

  • सुकन्या समृद्धि योजना 2021 Chart के अंतर्गत खाता खोलने के बाद, बालिका के 21 साल के होने या 18 साल के बाद उसके विवाह होने तक चलाया जा सकता है।
  • केवल भारत के मूल निवासी ही सुकन्या समृद्धि योजना के नये नियम के अनुसार इस योजना का लाभ उठा सकते है।
  • ऐसी बालिका जो इस Sukanya Samriddhi Yojana (SSY) के पूर्ण होने से पूर्व भारत को छोड कर किसी अन्य देश में रहने लगे, तो ऐसी स्थिति में वह बालिका इस योजना से वंचित रह जाएगी।
  • इस योजना के नये नियमानुसार माता/पिता व अभिभावक को एक माह के भीतर यदि आवसीय स्थिति बदलती है, तो सूचना उपलब्ध करानी पडे़गी।
  • बालिका का जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate)।
  • जमाकर्ता (माता-पिता या कानूनी अभिभावक) का पहचान प्रमाण यानी पैन कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट आदि।
  • जमाकर्ता (माता-पिता या कानूनी अभिभावक) का पता प्रमाण।
  • Sukanya Samriddhi Yojana के तहत बचत खाता खोलने का आवेदन पत्र।
  • सुकन्या समृद्धि योजना 2021 List

PM सुकन्या समृद्धि योजना आवेदन फॉर्म पीडीएफ डाउनलोड

Sukanya Samriddhi Yojana 2021 Application Form PDF – यह सुकन्या समृद्धि योजना शुरू करने के लिए, आपको बालिका के नाम पर एक बैंक खाता खोलना होगा। जिसके बाद, निम्न चरणों का पालन करें।

  1. SSY 2021 बैंक खाता खोलने के लिए, अपने नजदीकी बैंक शाखा या अपने क्षेत्रीय डाकघर में जाएँ।
  2. फिर आवश्यक विवरण के साथ बैंक खाता फ़ॉर्म भरें, जो इसमें उल्लिखित होगा।
  3. सभी विवरण सही ढंग से भरें, अन्यथा आपका आवेदन फॉर्म स्वीकार्य नहीं होगा।
  4. अंत में सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ बैंक शाखा प्रबंधक को सुकन्या समृद्धि योजना 2020 बैंक खाता फॉर्म जमा करें।
  5. इस तरह से आप सुकन्या समृद्धि योजना 2021 Online Form भर सकते हैं।

Note – सुकन्या समृद्धि योजना के तहत खाता खोलने के लिए आवेदन फॉर्म PDF डाउनलोड करें।

Download SSY Application Form PDF

कृपया ध्यान दें – सुकन्या समृद्धि योजना फॉर्म डाउनलोड या Sukanya Samriddhi Yojana Online Form भरने के लिए आपको सम्बंधित बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर जाना होगा, जहाँ आपको अपनी बेटी का अकाउंट खुलवाना है। इस योजना के बारे में और अधिक जानने के लिए अपने नजदीकी डाकघर (पोस्ट-ऑफिस) में संपर्क करें। धन्यवाद-

Sukanya Samriddhi Yojana ऑनलाइन आवेदन कैसे करें?

  1. अगर आपको Sukanya Samriddhi Yojana Online Apply करना है तो आपको 28 राष्ट्रीयकृत बैंकों में से किसी भी बैंक की वेबसाइट पर जाना होगा, जिस बैंक में आप अपनी बेटी का खाता खुलवाना चाहते हैं।
  2. उस बैंक की ऑफिशियल वेबसाइट पर आपको सुकन्या समृद्धि योजना (SSY Online Registration) का लिंक मिलेगा, जिस पर आपको रजिस्ट्रेशन करना है।
  3. सुकन्या समृद्धि योजना Online Form 2021 पर आपको अपनी तथा अपनी बेटी की पूरी जानकारी ध्यानपूर्वक भरनी होगी।
  4. साथ ही आपका परिचय प्रमाण पत्र, आवास पता और आपकी बेटी का जन्म प्रमाण पत्र चाहिए होगा।
  5. आपके द्वारा दी गई जानकारियों को बैंक द्वारा प्रमाणित किया जाएगा और अब सभी दस्तावेज को ऑनलाइन अपलोड करने के बाद, सबमिट बटन पर क्लिक कर दें। इसके पश्चात, आपको बैंक में आपकी पहली जमा राशि को बेटी के खाते में डालना होगा और और प्रधानमंत्री सुकन्या योजना फॉर्म खाता चालू करवाना होगा।

Sukanya Samriddhi Yojana Online Form (FAQs)-

सुकन्या समृद्धि योजना का लाभ लेने के लिए कितनी धनराशि जमा होगी?
  • Sukanya Samriddhi Yojana के अंतर्गत बेटी के पैदा होने से लेकर 10 वर्ष तक की बेटियों का अकाउंट खोला जाता है। यह अकाउंट आप अपने नजदीकी किसी भी बैंक में किसी पोस्ट-ऑफिस में खोल सकते हैं। इस योजना में आपको अपनी बेटी के नाम पर अकाउंट में ₹1000 (एक हजार रुपये) की न्यूनतम धनराशि जमा करनी होती है, और जब आपकी बेटी विवाह के योग्य (18 वर्ष से ऊपर) हो जाएगी, तो उसकी पढ़ाई के लिए धनराशि निकाली जा सकती है।
पीएम सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत कौन अकाउंट खोल सकता है?
  • Sukanya Samriddhi Yojana के अंतर्गत बेटी के पैदा होने से लेकर 10 वर्ष की आयु तक ही अकाउंट खोला जा सकता है। बेटी की आयु 10 वर्ष से ऊपर होने पर आप अपनी बेटी का अकाउंट नहीं खोल सकते।
सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत आप कितने अकाउंट खोल सकते हैं?
  • Sukanya Samriddhi Yojana के अंतर्गत आप बेटी के नाम पर केवल एक ही अकाउंट और केवल दो बेटियों के नाम पर ही अकाउंट खोल सकते हैं। अगर आपकी पहली संतान कन्या है और दूसरी संतान दो कन्या हैं अर्थात दो जुड़वा का कन्या है तो आप तीन अकाउंट खुलवा सकते हैं।
सुकन्या समृद्धि योजना के अंतर्गत कितनी धनराशि जमा होगी?
  • Sukanya Samriddhi Yojana के अंतर्गत खाता खोलने के बाद न्यूनतम एक हजार रुपये तक की धनराशि आप अपनी बेटी के नाम पर जमा कर सकते हैं और आप अपनी बेटी के नाम पर अधिकतम डेढ़ लाख रुपये तक की राशि को जमा कर सकते हैं।
Sukanya Samriddhi Yojana खाते में कब तक पैसा जमा करने होंगे?
  • योजना के अंतर्गत आप अपनी बेटी के खाते में केवल 15 वर्षों तक ही पैसे को जमा कर सकते हैं। 16 वर्ष होते ही आपके खाते में कोई पैसा जमा नहीं होगा, पर आपको 16 वर्ष से 21 वर्ष तक ब्याज मिलता रहेगा। जिसे आप अपनी बेटी के सपनों को पूरा कर पाएंगे।
समृद्धि योजना के अंतर्गत ब्याज दर (Interest Rate) क्या है?
  • Sukanya Samridhi Scheme के अंतर्गत पिछले साल ब्याज दर 8.4% थी, किंतु इस वर्ष 2020-2021 में यह दर घटाकर 7.6​​% Per Annum कर दी गई है।

सुकन्या समृद्धि योजना २०२१ ऑनलाइन फॉर्म (Bank List)-

भारत सरकार द्वारा Sukanya Samriddhi Yojana Account खोलने के लिए अधिकृत किए गए बैंकों की सूची निम्न प्रकार से है:

State Bank of India (SBI)

State Bank of Mysore (SBM)

State Bank of Hyderabad (SBH)

State Bank of Travancore (SBT)

State Bank of Bikaner & Jaipur (SBBJ)

State Bank of Patiala (SBP)

Vijaya Bank

United Bank of India

Union Bank of India

UCO Bank

Syndicate Bank

Punjab national bank (PNB)

Punjab & Sind Bank (PSB)

Oriental Bank of Commerce (OBC)

Indian Overseas Bank (IOB)

Indian Bank

IDBI Bank

ICICI Bank

Dena Bank

Corporation Bank

Central Bank of India (CBI)

Canara Bank

Bank of Maharashtra (BOM)

Bank of India (BOI)

Bank of Baroda (BOB)

Axis Bank

Andhra Bank

Allahabad Bank

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मुख्यमंत्री सुकन्या योजना झारखंड 2021 – 18 वर्ष तक की बालिकाओं के लिये प्रोत्साहन राशि (आर्थिक मदद) के आवेदन फॉर्म, योग्यता, दस्तावेज़ [MukhyaMantri Sukanya Yojana Jharkhand In Hindi- Form, Eligibility, Documents]

झारखंड सरकार की योजनाओं की लिस्ट में मुख्यमंत्री सुकन्या योजना, एक नयी योजना जुड़ रही हैं जो बालिकाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुये लाई गई हैं।  इस योजना का उद्देश्य बाल विवाह को रोकना एवं बालिकाओं को उचित पोषण प्रदान करना हैं जिसके लिए झारखंड सरकार बालिकाओं के जन्म से 18 वर्ष तक की आयु में उन्हे प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी।

यह राशि डीबीटी सुविधा के जरिये सीधे बैंक खाते में जमा की जायेगी। झारखंड मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के लिए कैसे आवेदन करे और योजना की पात्रता एवं लगने वाले दस्तावेज़ आदि जानकारी इस आर्टिकल में लिखी जा रही हैं ।

नामझारखंड मुख्यमंत्री सुकन्या योजनायोजना की घोषणा किसने कीसीएम रघुबरदासयोजना कब शुरू होना हैंजनवरी 2019विशेष लाभार्थी कौन हैंबेटियाँ [18 वर्ष तक]टोलफ्री हेल्पलाइन नंबरNAऑनलाइन पोर्टलNAराशि40 हजार 

प्रोत्साहन राशी एवं चरण

इस योजना के भीतर राशि विभिन्न चरणों में मिलेगी जिसकी शुरुवात बेटी के जन्म से ही हो जायेगी –चरणराशिजन्म से दो वर्ष की आयु तक5000 रुपयेपहली क्लास में प्रवेश लेने पर5000 रुपयेपाँचवी कक्षा उत्त्तीर्ण करने पर एवं छठवी कक्षा में प्रवेश लेने पर5000 रुपयेआठवी कक्षा उत्तीर्ण करने पर5000 रुपयेदसवी कक्षा उत्तीर्ण करने पर5000 रुपयेबारहवी कक्षा उत्तीर्ण करने पर5000 रुपयेकूल राशि 18 वर्ष तक30 हजार रुपयेअगर बेटी की शादी 18 से 20 वर्ष तक नहीं हुई हैं तो10 हजार रुपयेइस तरह कूल मिलने वाली राशि40 हजार रुपये

मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के उद्देश्य एवं लाभ क्या हैं ? [Mukhyamantri Sukanya Yojana Jharkhand Benefits] 

  1. योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर उन्हे उचित पोषण प्रदान करना हैं जिससे प्रदेश में बढ़ते शिशु मृत्यु दर में इजाफ़ा होगा । पिछले 4 साल से सरकार इस ओर कार्य कर रही हैं लेकिन अभी भी टार्गेट प्राप्त करने में अभी समय लगेगा ।
  2. मुख्यमंत्री सुकन्या योजना का एक उद्देश्य यह भी हैं कि सरकार की मदद से लड़कियाँ परिवार पर बोझ ना समझी जाये और इस कारण कम उम्र में उनका विवाह ना हो अपितु उनकी उचित परवरिश की जाये।
  3. इस कार्य के लिए सरकार के साथ यूनिसेफ एवं सामाजिक संगठन का भी योगदान हैं । इसमें ग्राम पंचायत को भी शामिल किया जायेगा ताकि जागरूकता बढाई जा सके.
  4. मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के जरिये जो भी पैसा दिया जाना हैं वो सीधे लड़की अथवा पालक के बैंक खाते में जमा किया जायेगा।
  5. योजना के भीतरलड़कियों को जन्म से 18 वर्ष तक की आयु सरकार की तरफ से पैसा दिया जायेगा जो कि विभिन्न चरणों में उन तक पहुंचाया जायेगा । लड़की के पालन पोषण, उसकी प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक  शिक्षा आदि सभी के लिये आर्थिक सहायता सरकार द्वारा दी जायेगी ।
  6. सरकार का मानना हैं कि इस योजना से तहत 35 लाख परिवारों को लाभ प्राप्त होगा ।
  7. प्रदेश के पांच जिले ऐसे हैं जहाँ ज्यादातर बेटियों की शादी 18 के पहले ही कर दी जाती हैं इसलिए उन जिलो पर अधिक ध्यान दिया जायेगा . उन जिलो के नाम देवघर, गोड्डा, कोडरमा, गिरिडीह एवं पलामू हैं .

मुख्यमंत्री सुकन्या योजना की पात्रता अथवा योग्यता क्या हैं ? [Sukanya Yojana Eligibility Criteria] https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-7372313818978296&output=html&h=300&slotname=3893694508&adk=1836558397&adf=4061037818&pi=t.ma~as.3893694508&w=360&lmt=1624054781&rafmt=1&psa=0&format=360×300&url=https%3A%2F%2Fwww.yojanaschemehindi.com%2Fmukhyamantri-sukanya-jharkhand-form-%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%2581%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25AF%25E0%25A4%25BE-%25E0%25A4%25AF%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25BE%2F&flash=0&fwr=1&fwrattr=true&rpe=1&resp_fmts=3&sfro=1&wgl=1&adsid=ChAI8IixhgYQ9NvizLjdtoE5EkwA2XWSzrDL92wW2Y3ejHElAjxUfuACUUjLPQdgRJxNEXgCINuUJ9PZQADKGHbCqvWb2MFfwKQYXkpglCEkum-pDeGkFtP6XxnIWIad&dt=1624076909107&bpp=17&bdt=2041&idt=2150&shv=r20210616&cbv=%2Fr20190131&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df396557312e39352-223ac10199c900f8%3AT%3D1624076911%3ART%3D1624076911%3AS%3DALNI_MadWD1HMuKxHkeZAFRZrqIDMo7HvA&prev_fmts=360×300%2C360x300%2C360x300%2C360x300%2C0x0&nras=1&correlator=5182842435363&frm=20&pv=1&ga_vid=494718968.1624076910&ga_sid=1624076910&ga_hid=1473907244&ga_fc=0&u_tz=330&u_his=1&u_java=0&u_h=640&u_w=360&u_ah=640&u_aw=360&u_cd=24&u_nplug=0&u_nmime=0&adx=0&ady=4533&biw=360&bih=562&scr_x=0&scr_y=329&eid=42530671%2C31060614%2C31060974%2C31060474&oid=3&psts=AGkb-H-Pbl29foDaKJX8mLznj1To0xhG_enjdm6ghZdngUitk55ZyLVpMzzCwJsfYinwwdLp4nSLlDa0Yice%2CAGkb-H_5Ew1TjCl1KHuuG4Caa0kXEBu4aonCTR3TAtn9YzOnCa2SsraE3uEGboLkAS7m9Yxtxl0D1I0pby9r%2CAGkb-H9hcq07fu2p-9fQW8dbASArQGFINEojvhfEYOWnWgOk6kWUWdXH58nmAhOOBbKfyfwLC615UjZGcvCo%2CAGkb-H8yDHYdwTMkyVj5gE3JBBYXPm9raN_bo7e9XHnKSLmUybikt9nZVk1eZ1sZ2ARPdPt8OJp-cO-VDDN4&pvsid=267299729496469&pem=844&ref=android-app%3A%2F%2Fcom.google.android.googlequicksearchbox&eae=0&fc=896&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C360%2C0%2C360%2C618%2C360%2C618&vis=1&rsz=%7C%7CeEbr%7C&abl=CS&pfx=0&fu=128&bc=31&jar=2021-06-16-15&ifi=5&uci=a!5&btvi=4&fsb=1&xpc=QThuP6dVdq&p=https%3A//www.yojanaschemehindi.com&dtd=7077

  1. योजना के लिए वही परिवार योग्य होंगे जिनके नाम SECC- 2011 की लिस्ट में नाम हैं अर्थात उन्ही परिवारों की बेटियों को लाभ मिलेगा . अब तक लगभग 25 लाख परिवार इस जनगणना के जरिये इस योजना का लाभ ले सकते हैं .
  2. इसके आलावा जिनके पास अन्त्योदय राशन कार्ड हैं वे परिवार भी इस योजना में शामिल होकर लाभ ले सकते हैं और इसके जरिये 10 लाख परिवारों के जुड़ने की उम्मीद हैं .
  3. योजना शिशु बालिका के लिये शुरू की गई हैं अतः जन्म के तुरंत बाद इस योजना का लाभ लिया जा सकता हैं, 18 से अधिक की आयु में इसका लाभ तब ही मिलेगा जब बेटी 20 वर्ष तक कुँवारी हो । अतः बेटी के जन्म के बाद ही योजना के भीतर पंजीयन करवाले ।
  4. मुख्यमंत्री सुकन्या योजना में मिलने वाली प्रोत्साहन राशि सीधे खाते में जमा होगी अतः जरूरी हैं कि बेटी के पालकों का बैंक में एक खाता हो, खाता ना होने पर आपको योजना का लाभ नहीं मिलेगा ।
  5. योजना के भीतर डीबीटी सुविधा के अंतर्गत पैसा मिलेगा अतः आपका खाता आधार से लिंक्ड होना भी अनिवार्य हैं ।
  6. वही बच्चियाँ मान्य होंगी जो कि झारखंड स्टेट की रहने वाली हो । राज्य के बाहर इस योजना का लाभ लेना संभव नहीं हैं । इसके लिये आपके पास उचित प्रमाण होना आवश्यक हैं कि आप झारखंड के ही रहवासी हैं ।

मुख्यमंत्री सुकन्या योजना में दस्तावेज़ कौन – कौन से लगेंगे ? [Mukhyamantri Sukanya Yojana Documents List]

  1. योजना का लाभ उठाने के लिये जरूरी हैं आपके पासनिवासी प्रमाणपत्र हो । अगर नहीं हैं तो लाभ नहीं मिलेगा ।
  2. बेटी के जन्म संबंधी दस्तावेज़ अर्थातजन्म प्रमाणपत्र एवं आधार कार्ड होना भी जरूरी हैं , वरना योजना में नामांकन नहीं हो पाएगा ।
  3. बैंक पुस्तिका की कॉपीभी जरूरी हैं क्यूंकि पैसा अकाउंट में जमा होगा इसलिए यह जानकारी देना जरूरी हैं ।
  4. बच्ची को शिक्षित करना अनिवार्य हैं तब ही विभिन्न चरणों में लाभ मिलेगा अतः आपको यह प्रूफ भी देना होगा कि आपकी बेटी शाला जाती हैं ।शाला प्रमाणपत्र देना आवश्यक होगा । 

मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के लिये आवेदन फॉर्म अथवा पंजीयन कैसे करवाये ? [Sukanya Yojana Form]

यह राज्यस्तर पर शुरू की गई एक योजना हैं । अतः इसके भीतर नामांकन करवाने से संबंधी जानकारी राज्य के ऑनलाइन पोर्टल में दे दी जायेगी। अथवा आँगनवाड़ी के सदस्यों के पास भी इससे संबंधी जानकारी मिलेगी । लेकिन अभी यह योजना 2019 में प्रदेश मे काम करना शुरू करेगी, इसलिए अब तक आवेदन संबंधी जानकारी नहीं दी गई हैं । आप हमारी साइट को सब्सक्राइब कर ले जैसे ही पंजीयन की जानकारी मिलेगी इसमे लिख दी जायेगी ।

केंद्र की योजनाओं में भी महिला विशेष का स्थान अधिक हैं अतः केंद्र सरकार महिलाओं के लिये कई योजना का विमोचन करती रहती हैं । वहीं उसी दिशा में राज्यस्तर पर भी कई योजना काम करते हैं जैसे एमपी की लाड़ली लक्ष्मी योजना एवं बिहार कन्या उत्थात्न योजना भी, झारखंड की इस योजना के समान ही हैं ।

झारखंड सरकार ने यह भी घोषणा की हैं कि वो पहले से चलने वाली लाड़ली लक्ष्मी योजना एवं मुख्यमंत्री कन्यादान योजना को बंद कर देगी और सभी लाभ मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के अंतर्गत ही देगी ।

इस तरह की योजना बालिकाओं के विकास के लिए बहुत जरूरी हैं क्यूंकि आर्थिक सहायता के करना बालिकाएँ शिक्षित हो पाती हैं जिससे उनके एवं समाज के जीवन स्तर में सुधार आता हैं ।

💐💐पहला सुख निरोगी काया💐💐अपने डॉक्टर खुद बने(वैद्यकीय डॉक्टर से सलाह भी ले)

1 = केवल सेंधा नमक प्रयोग करे!थायराईड बी पी और पेट ठीक होगा!
2 = केवल स्टील का कुकर ही प्रयोग करें!अल्युमिनियम में मिले हुए लेड से होने वाले नुकसानों से बचेंगे!
3 = कोई भी रिफाइंड तेल ना खाकर केवल तिल! मूंगफली सरसों और नारियल का प्रयोग करें!रिफाइंड में बहुत केमिकल होते है!जो शरीर में कई तरह की बीमारियाँ पैदा करते है!
4 = सोयाबीन बड़ी को 2 घण्टे भिगो कर मसल कर ज़हरीली झाग निकल कर ही प्रयोग करे!
5 = रसोई में एग्जास्ट फैन जरूरी है!प्रदूषित हवा बाहर करे!
6 = काम करते समय स्वयं को अच्छा लगने वाला संगीत चलाएं। खाने में भी अच्छा प्रभाव आएगा और थकान कम होगी!
7 = देसी गाय के घी का प्रयोग बढ़ाएं। अनेक रोग दूर होंगे, वजन नहीं बढ़ता!
8 = ज्यादा से ज्यादा मीठा नीम/कढ़ी पत्ता खाने की चीजों में डालें सभी का स्वास्थ्य ठीक करेगा!
9 = ज्यादा से ज्यादा चीजें लोहे की कढ़ाई में ही बनाएं! आयरन की कमी किसी को नहीं होगी!
10 = भोजन का समय निश्चित करे!पेट ठीक रहेगा! भोजन के बीच बात न करें!भोजन ज्यादा पोषण देगा!
11 = नाश्ते में अंकुरित अन्न शामिल करें!पोषक विटामिन और फाइबर मिलेंगे!
12 = सुबह के खाने के साथ देशी गाय के दूध का बना ताजा दही लें पेट ठीक रहेगा!
13 = चीनी कम से कम प्रयोग करें!ज्यादा उम्र में हड्डियां ठीक रहेंगी!
14 = चीनी की जगह बिना मसले का गुड़ या देशी शक्कर ले!
15 = छौंक में राई के साथ कलौंजी का भी प्रयोग करे! फायदे इतने कि लिख ही नहीं सकते!
16 = चाय के समय आयुर्वेदिक पेय की आदत बनाएं व निरोग रहेंगे!
17 = एक डस्टबिन रसोई में और एक बाहर रखें!सोने से पहले रसोई का कचरा बाहर के डस्ट बिन में डालें!
18 = रसोई में घुसते ही नाक में घी या सरसों का तेल लगाएं सर और फेफड़े स्वस्थ रहेंगें!
19 = करेले मैथी और मूली यानि कड़वी सब्जियां भी खाएँ, रक्त शुद्ध रहेगा!
20 = पानी मटके वाले से ज्यादा ठंडा न पिएं, पाचन व दांत ठीक रहेंगे!
21 = प्लास्टिक और अल्युमिनियम रसोई से हटाएं दोनों केन्सर कारक है!
22‌ = माइक्रोवेव ओवन का प्रयोग कैंसर कारक है!
23 = खाने की ठंडी चीजें कम से कम खाएँ पेट और दांत को खराब करती हैं!
24 = बाहर का खाना बहुत हानिकारक है!खाने से सम्बंधित ग्रुप से जुड़कर सब घर पर ही बनाएं!
25 = तली चीजें छोड़ें वजन पेट एसिडिटी ठीक रहेंगी!
26 = मैदा बेसन छौले राजमां और उड़द कम खाएँ गैस की समस्या से बचेंगे!
27 = अदरक अजवायन का प्रयोग बढ़ाएं गैस और शरीर के दर्द कम होंगे!
28 = बिना कलौंजी वाला अचार हानिकारक होता है!
29 = पानी का फिल्टर R O वाला हानिकारक है!-U V वाला ही प्रयोग करे!सस्ता भी और बढ़िया भी!
30 = रसोई में ही बहुत से कॉस्मेटिक्स हैं!इस प्रकार के ग्रुप से जानकारी लें!
31 = रात को आधा चम्मच त्रिफला एक कप पानी में डाल कर रखें!सुबह कपड़े से छान कर इस जल से आंखें धोएं, चश्मा उतर जाएगा। छानने के बाद जो पाउडर बचे उसे फिर एक गिलास पानी में डाल कर रख दें!रात को पी जाएं!पेट साफ होगा कोई रोग एक साल में नहीं रहेगा
32 = सुबह रसोई में चप्पल न पहनें शुद्धता भी एक्यू प्रेशर भी!
33 = रात का भिगोया आधा चम्मच कच्चा जीरा सुबह खाली पेट चबा कर वही पानी पिएं एसिडिटी खतम!
34 = एक्यूप्रेशर वाले पिरामिड प्लेटफार्म पर खड़े होकर खाना बनाने की आदत बना लें तो भी सब बीमारियां शरीर से निकल जायेंगी!
35 = चौथाई चम्मच दालचीनी का कुल उपयोग दिन भर में किसी भी रूप में करने पर निरोगता अवश्य होगी!
36 = रसोई के मसालों से बनी चाय मसाला स्वास्थ्यवर्धक है!
37 = सर्दियों में नाखून के बराबर जावित्री कभी चूसने से सर्दी के असर से बचाव होगा!
38 = सर्दी में बाहर जाते समय 2 चुटकी अजवायन मुहं में रखकर निकलिए सर्दी से नुकसान नहीं होगा!
39 = रस निकले नीबू के चौथाई टुकड़े में जरा सी हल्दी! नमक फिटकरी रख कर दांत मलने से दांतों का कोई भी रोग नहीं रहेगा!
40 = कभी – कभी नमक – हल्दी में 2 बून्द सरसों का तेल डाल कर दांतों को उंगली से साफ करें दांतों का कोई रोग टिक नहीं सकता!
41 = बुखार में 1 लीटर पानी उबाल कर 250 ml कर लें, साधारण ताप पर आ जाने पर रोगी को थोड़ा थोड़ा दें, दवा का काम करेगा!
42 = सुबह के खाने के साथ घर का जमाया देशी गाय का ताजा दही जरूर शामिल करें! प्रोबायोटिक का काम करेगा!


हृदय की बीमारी के आयुर्वेदिक इलाज!

हमारे देश भारत मे 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे!उनका नाम था महाऋषि वागवट जी!!

उन्होने एक पुस्तक लिखी थी!जिसका नाम है अष्टांग हृदयम!-(Astang Hridayam)

इस पुस्तक मे उन्होने बीमारियो को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखे थे!
यह उनमे से ही एक सूत्र है !!

वागवट जी लिखते है!कि कभी भी हृदय को घात हो रहा है!मतलब दिल की नलियों मे Blockage होना शुरू हो रहा है तो इसका मतलब है कि रक्त (Blood) मे Acidity (अम्लता) बढ़ी हुई है!

अम्लता आप समझते है!जिसको अँग्रेजी में Acidity भी कहते हैं और यह अम्लता दो तरह की होती है !

एक होती है पेट कि अम्लता !
और
एक होती है रक्त (Blood) की अम्लता !

आपके पेट मे अम्लता जब बढ़ती है तो आप कहेंगे पेट मे जलन सी हो रही है!खट्टी खट्टी डकार आ रही है!मुंह से पानी निकल रहा है!और अगर ये अम्लता (Acidity) और बढ़ जाये तो इसे Hyperacidity कहते हैं!

फिर यही पेट की अम्लता बढ़ते – बढ़ते जब रक्त मे आती है!तो रक्त अम्लता-(Blood Acidity) होती है!और जब Blood मे Acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त दिल की नलियों में से निकल नहीं पाता और नलियों में Blockage कर देता है और तभी Heart Attack होता है!इसके बिना Heart Attack नहीं होता और ये आयुर्वेद का सबसे बढ़ा सच है!जिसको कोई डाक्टर आपको बताता नहीं!क्योंकि इसका इलाज सबसे सरल है !!
एसीडिटी का इलाज क्या है!
वागबट जी आगे लिखते है कि जब रक्त (Blood) में अम्लता (Acidity) बढ़ गई है!तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करें जो क्षारीय है!

आप जानते है!दो तरह की चीजे होती है!

अम्लीय (Acidic)
और
क्षारीय (Alkaline)

अब अम्ल और क्षार (Acid and Alkaline) को मिला दें तो क्या होता है!

हम सब जानते है!Neutral होता है!

तो वागबट जी लिखते है!कि रक्त की अम्लता बढ़ी हुई है! तो क्षारीय (Alkaline) चीजे खाओ!तो रक्त की अम्लता (Acidity) Neutral हो जाएगी और जब रक्त मे अम्लता Neutral हो गई तो Heart Attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं होगी!

ये है सारी कहानी!

अब आप पूछोगे जी ऐसे कौन सी चीजे है जो क्षारीय है! और हम खाये!

आपके रसोई घर मे ऐसी बहुत सी चीजे है जो क्षारीय है! जिन्हें अगर आप खायें तो कभी Heart Attack न आयेगा और अगर आ गया तो दुबारा नहीं आएगा!

आपके घर में जो सबसे ज्यादा क्षारीय चीज है वह है! लौकी जिसे हम दुधी भी कहते है!और English मे इसे Bottle Gourd भी कहते हैं जिसे आप सब्जी के रूप मे खाते है!

इससे ज्यादा कोई क्षारीय चीज ही नहीं है!इसलिये आप हर रोज़ लौकी का रस निकाल कर पियें या अगर खा सकते है!तो कच्ची लौकी खायें!

वागवतट जी के अनुसार रक्त की अम्लता कम करने की सबसे ज्यादा ताकत लौकी में ही है!इसलिए आप लौकी के रस का सेवन करें!

कितना मात्रा में सेवन करें!

रोज 200 से 300 ग्राम लौकी का रस ग्राम पियें!

कब पिये!

सुबह खाली पेट (Toilet) शौच जाने के बाद पी सकते है!या फिर नाश्ते के आधे घंटे के बाद पी सकते हैं!

इस लौकी के रस को आप और ज्यादा क्षारीय भी बना सकते हैं!जिसके लिए इसमें 7 से 10 पत्ते के तुलसी के डाल लें क्योंकि तुलसी बहुत क्षारीय है!

इसके साथ आप पुदीने के 7 से 10 पत्ते भी मिला सकते है!क्योंकि पुदीना भी बहुत क्षारीय होता है!

इसके साथ आप इसमें काला नमक या सेंधा नमक भी जरूर डाले!ये भी बहुत क्षारीय है!याद रखे नमक काला या सेंधा ही डालें दूसरा आयोडीन युक्त नमक कभी न डालें!

ये आओडीन युक्त नमक अम्लीय है!

तो मित्रों आप इस लौकी के जूस का सेवन जरूर करे 2 से 3 महीने आपकी सारी Heart की Blockage ठीक कर देगा!-21 वे दिन ही आपको बहुत ज्यादा असर दिखना शुरू हो जाएगा और फिर आपको कोई आपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी!

घर मे ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा और आपका अनमोल शरीर और लाखों रुपए आपरेशन के बच जाएँगे और जो पैसे बच जायें उसे अगर इच्छा हो किसी गौशाला मे दान कर दें क्योंकि डाक्टर को देने से अच्छा है किसी गौशाला दान दे!

हमारी गौ माता बचेगी तो भारत बचेगा….!!


हल्दी का पानी
~~~~•
पानी में हल्दी मिलाकर पीने से यह 7 फायदें होते है…!!

  1. गुनगुना हल्दी वाला पानी पीने से दिमाग तेज होता है! सुबह के समय हल्दी का गुनगुना पानी पीने से दिमाग तेज और उर्जावान बनता है!

2.‌ आप यदि रोज़ हल्दी का पानी पीते हैं!तो इससे खून में होने वाली गंदगी साफ होती है!और खून जमता भी नहीं है!यह खून साफ करता है!और दिल को बीमारियों से भी बचाता है!

  1. लीवर की समस्या से परेशान लोगों के लिए हल्दी का पानी किसी औषधि से कम नही है!क्योंकि हल्दी का पानी टाॅक्सिस लीवर के सेल्स को फिर से ठीक करता है! इसके अलावा हल्दी और पानी के मिले हुए गुण लीवर को संक्रमण से भी बचाते हैं!
  2. हार्ट की समस्या से परेशान लोगों को हल्दी वाला पानी पीना चाहिए क्योंकि हल्दी खून को गाढ़ा होने से बचाती है जिससे हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है…!!
  3. जब हल्दी के पानी में शहद और नींबू मिलाया जाता है!तब यह शरीर के अंदर जमे हुए विषैले पदार्थों को निकाल देता है!जिसे पीने से शरीर पर बढ़ती हुई उम्र का असर नहीं पड़ता है!हल्दी में फ्री रेडिकल्स होते हैं जो सेहत और सौंदर्य को बढ़ाते है…!!
  4. शरीर में किसी भी तरह की सूजन हो और वह किसी दवाई से ना ठीक हो रही हो तो आप हल्दी वाला पानी का सेवन करें!हल्दी में करक्यूमिन तत्व होता है!जो सूजन और जोड़ों में होने वाले असहय दर्द को ठीक कर देता है! सूजन की अचूक दवा है हल्दी का पानी!
  5. कैंसर खत्म करती है हल्दी!हल्दी कैंसर से लड़ती है! और उसे बढ़ने से भी रोक देती है!क्योंकि हल्दी एंटी – कैंसर युक्त होती है!और यदि आप सप्ताह में तीन दिन हल्दी वाला पानी पीएगें तो आपको भविष्य में कैंसर से हमेशा बचे रहेगे!
    🕉🕉🕉🕉🕉🕉
    हमारे वेदों के अनुसार स्वस्थ रहने के १५ नियम हैं…!!

१ – खाना खाने के १.३० घंटे बाद ही पानी पीना चाहिए!

२ – पानी घूँट घूँट करके पीना है!जिससे अपनी मुँह की लार पानी के साथ मिलकर पेट में जा सके पेट में Acid बनता है और मुँह में छार दोनो पेट में बराबर मिल जाए तो कोई रोग पास नहीं आएगा!

३ – पानी कभी भी ठंडा (फ़्रिज़ का) नहीं पीना है!

४ – सुबह उठते ही बिना क़ुल्ला किए २ ग्लास पानी पीना चाहिए!रात भर जो अपने मुँह में लार है!वो अमूल्य है! उसको पेट में ही जाना ही चाहिए!

५ – खाना जितने आपके मुँह में दाँत है!उतनी बार ही चबाना है!

६ – खाना ज़मीन में पलोथी मुद्रा में बैठकर या उखड़ूँ बैठकर ही खाना चाहिए!

७ – खाने के मेन्यू में एक दूसरे के विरोधी भोजन एक साथ ना करे जैसे दूध के साथ दही प्याज़ के साथ दूध दही के साथ उड़द की दlल!

८ – समुद्री नमक की जगह सेंधा नमक या काला नमक खाना चाहिए!

९ – रीफ़ाइन तेल डालडा ज़हर है!इसकी जगह अपने इलाक़े के अनुसार सरसों तिल मूँगफली या नारियल का तेल उपयोग में लाए!सोयाबीन के कोई भी प्रोडक्ट खाने में ना ले इसके प्रोडक्ट को केवल सुअर पचा सकते है! आदमी में इसके पचाने के एंज़िम नहीं बनते हैं!

१० – दोपहर के भोजन के बाद कम से कम ३० मिनट आराम करना चाहिए और शाम के भोजन बाद ५०० क़दम पैदल चलना चाहिए!

११ – घर में चीनी (शुगर) का उपयोग नहीं होना चाहिए क्योंकि चीनी को सफ़ेद करने में १७ तरह के ज़हर (केमिकल ) मिलाने पड़ते है!इसकी जगह गुड़ का उपयोग करना चाहिए और आज कल गुड़ बनाने में कॉस्टिक सोडा (ज़हर) मिलाकर गुड को सफ़ेद किया जाता है!इसलिए सफ़ेद गुड़ ना खाए!प्राकृतिक गुड़ ही खाये!प्राकृतिक गुड़ चाकलेट कलर का होता है!

१२ – सोते समय आपका सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ़ होना चाहिए!

१३ – घर में कोई भी अलूमिनियम के बर्तन या कुकर नहीं होना चाहिए!हमारे बर्तन मिट्टी पीतल लोहा और काँसा के होने चाहिए!

१४ – दोपहर का भोजन ११ बजे तक अवश्य और शाम का भोजन सूर्यास्त तक हो जाना चाहिए!

१५ – सुबह भोर के समय तक आपको देशी गाय के दूध से बनी छाछ (सेंधl नमक और ज़ीरा बिना भुना हुआ मिलाकर) पीना चाहिए!

यदि आपने ये नियम अपने जीवन में लागू कर लिए तो आपको डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और देश के ८ लाख करोड़ की बचत होगी!यदि आप बीमार है!तो ये नियमों का पालन करने से आपके शरीर के सभी रोग (BP, शुगर ) अगले ३ माह से लेकर १२ माह में ख़त्म हो जाएँगे!


सर्दियों में उठायें मेथी दानों से भरपूर लाभ
➡ मेथीदाना उष्ण वात व कफनाशक पित्तवर्धक पाचनशक्ति व बलवर्धक एवं ह्रदय के लिए हितकर है! यह पुष्टिकारक शक्ति स्फूर्तिदायक टॉनिक की तरह कार्य करता है!सुबह–शाम इसे पानी के साथ निगलने से पेट को निरोग बनाता है!कब्ज व गैस को दूर करता है!इसकी मूँग के साथ सब्जी बनाकर भी खा सकते हैं!यह मधुमेह के रोगियों के लिए खूब लाभदायी है!

➡ अपनी आयु के जितने वर्ष व्यतीत हो चुके हैं!उतनी संख्या में मेथीदाने रोज धीरे–धीरे चबाना या चूसने से वृद्धावस्था में पैदा होने वाली व्याधियों जैसे घुटनों व जोड़ों का दर्द भूख न लगना हाथों का सुन्न पड़ जाना सायटिका मांसपेशियों का खिंचाव बार -बार मूत्र आना, चक्कर आना आदि में लाभ होता है!गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भुने मेथी दानों का चूर्ण आटे के साथ मिला के लड्डू बना के खाना लाभकारी है!
मेथी दाने से शक्तिवर्धक पेय
दो चम्मच मेथीदाने एक गिलास पानी में ४ – ५ घंटे भिगोकर रखें फिर इतना उबालें कि पानी चौथाई रह जाय इसे छानकर २ चम्मच शहद मिला के पियें!
औषधीय प्रयोग

  1. कब्ज : २० ग्राम मेथीदाने को २०० ग्राम ताजे पानी में भिगो दें. ५-६ घंटे बाद मसल के पीने से मल साफ़ आने लगता है!भूख अच्छी लगने लगती है और पाचन भी ठीक होने लगता है!
  2. जोड़ों का दर्द : १०० ग्राम मेथीदाने अधकच्चे भून के दरदरा कूट लें!इसमें २५ ग्राम काला नमक मिलाकर रख लें!-२ चम्मच यह मिश्रण सुबह-शाम गुनगुने पानी से फाँकने से जोड़ों कमर व घुटनों का दर्द आमवात (गठिया) का दर्द आदि में लाभ होता है!इससे पेट में गैस भी नहीं बनेगी!
  3. पेट के रोगों में :१ से ३ ग्राम मेथी दानों का चूर्ण सुबह दोपहर व शाम को पानी के साथ लेने से अपच दस्त भूख न लगना अफरा दर्द आदि तकलीफों में बहुत लाभ होता है!
  4. दुर्बलता : १ चम्मच मेथीदानों को घी में भून के सुबह – शाम लेने से रोगजन्य शारीरिक एवं तंत्रिका दुर्बलता दूर होती है!
  5. मासिक धर्म में रुकावट : ४ चम्मच मेथीदाने १ गिलास पानी में उबालें!आधा पानी रह जाने पर छानकर गर्म–गर्म ही लेने से मासिक धर्म खुल के होने लगता है!
  6. अंगों की जकड़न :भुनी मेथी के आटे में गुड़ की चाशनी मिला के लड्डू बना लें-१–१ लड्डू रोज सुबह खाने से वायु के कारण जकड़े हुए अंग १ सप्ताह में ठीक हो जाते हैं तथा हाथ–पैरों में होने वाला दर्द भी दूर होता है!
  7. विशेष : सर्दियों में मेथीपाक मेथी के लड्डू मेथीदानों व मूँग–दाल की सब्जी आदि के रूप में इसका सेवन खूब लाभदायी हैं!
    IMPORTANT
    HEART ATTACK और गर्म पानी पीना!

यह भोजन के बाद गर्म पानी पीने के बारे में ही नहीं Heart Attack के बारे में भी एक अच्छा लेख है!

चीनी और जापानी अपने भोजन के बाद गर्म चाय पीते हैं!ठंडा पानी नहीं!अब हमें भी उनकी यह आदत अपना लेनी चाहिए!जो लोग भोजन के बाद ठंडा पानी पीना पसन्द करते हैं!यह लेख उनके लिए ही है!

भोजन के साथ कोई ठंडा पेय या पानी पीना बहुत हानिकारक है!क्योंकि ठंडा पानी आपके भोजन के तैलीय पदार्थों को जो आपने अभी अभी खाये हैं!ठोस रूप में बदल देता है!

इससे पाचन बहुत धीमा हो जाता है!जब यह अम्ल के साथ क्रिया करता है!तो यह टूट जाता है!और जल्दी ही यह ठोस भोजन से भी अधिक तेज़ी से आँतों द्वारा सोख लिया जाता है!यह आँतों में एकत्र हो जाता है!फिर जल्दी ही यह चरबी में बदल जाता है!और कैंसर के पैदा होने का कारण बनता है!

इसलिए सबसे अच्छा यह है!कि भोजन के बाद गर्म सूप या गुनगुना पानी पिया जाये!एक गिलास गुनगुना पानी सोने से ठीक पहले पीना चाहिए!इससे खून के थक्के नहीं बनेंगे और आप हृदयाघात से बचे रहेंगे!💐💐अपने वेद जी की सलाह जरूर ले💐डॉक्टर से भी पूछे💐💐

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