क्या ब्राह्मणों ने दर्शन विज्ञान या भाषा संस्कृति व्याकरण योग इत्यादि में योगदान दिया ?

इंग्लैंड का लगभग हर पादरी मिलिनेयर है । कुछ मल्टी मिलिनेयर भी हैं । हर एक । चर्च ऑव इंग्लैंड से जुड़े लगभग चार सौ व्यक्ति हाउस ऑव लार्ड्स में हैं । और पिछले पाँच सौ वर्षों से हैं । इंग्लैंड के गाँवों के सबसे बड़े और आलीशान घर , चर्च से जुड़े लोगों के हैं , आज भी हैं ।

क्या किसी पादरी ने बाईबिल पर कमेंट्री लिखी है आजतक ?
क्या किसी पादरी पिछले 2000 वर्षों में दर्शन या विज्ञान में कोई योगदान दिया ?
क्या पादरी का घर क्षतिग्रस्त हो जाए तो उसे धन की चिंता करनी पड़ती है? जी नहीं ।

भारत में 1947 के बाद स्वतंत्र भारत ने किस एक ब्राह्मण को उसके ब्राह्मण होने के गुण के कारण , राज्य सभा में भेंजा ? वे पाँच सौ वर्षों में 5000 से अधिक पादरियों को लॉर्ड बना चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट का जज । और आपने क्या किया , जो भिक्षा माँगकर वेदांत पढ़ाता था उसे भी अपराधी बना दिया क्योंकि भिक्षा माँगना अपराध हो गया ।

क्या भारत के सभी गाँवों में ब्राह्मणों के पास सबसे अधिक ज़मीन या उनका आलीशान बंगला है ?

क्या ब्राह्मणों ने दर्शन विज्ञान या भाषा संस्कृति व्याकरण योग इत्यादि में योगदान दिया ? आपको उत्तर पता है ।

1947 के पहले किसी प्रकार हमारे पूर्वज धर्म का प्रचार कर पा रहे थे पर 1947 के बाद , कृतघ्न राष्ट्र ने गौ वध को प्रतिबंधित नहीं किया । मनु स्मृति, छाप छाप कर जलाई । ब्राह्मण नामधारी धूर्तों को उपर उठाया गया । और आज जिसे वर्ण , कर्म और स्वभाव का तारतम्य भी नहीं पता है वह जात पात के नाम पर ब्राह्मणों को गरिया रहा है ।

वे पादरी , जिनको उनके दैनिक कुकर्म के लिए, पोप वार्षिक माफ़ी देता है वे आ रहे हैं जातिहीन समाज की रचना हेतु । अधिक से अधिक क्या होगा ? पोप , हर महीने उनको माफ़ कर देगा । आसमानी किताबें आपको मुबारक हों !

इंग्लैंड के लगभग सौ गाँवों में जा चुका हूँ और अन्य लोग होंगे इसी फ़ेसबुक पर जो की चाहें तों स्वंयम सत्यापित कर लें ..

उन सभी सौ गाँवों में लगभग एक तिहाई ज़मीन उस गाँव की चर्च के पास है । उस गाँव के सबसे प्रतिष्ठित और मंहगे घर ( आमतौर से दस करोड़ से उपर की वैल्यू के अर्थात् एक मीलियन पौंड से अधिक ) किसी विशप, प्रीस्ट या चर्च से जुड़े व्यक्ति का है ।

वे सभी घर भी तीन सौ चार सौ वर्ष पुराने तक के हैं ।

इंग्लैंड में चर्च ऑव इंग्लैंड से जुड़े सभी लोगों का न केवल समुदाय पर अधिकार है बल्कि संसाधनों पर भी ।

जैसे मान लीजिए एक गाँव में एक चर्च है और उसके रिपेयर की बिल एक करोड़ रूपए आती है और उस गाँव में तीन सौ घर हैं तो उस रिपेयर का खर्चा उन तीन सौ लोगों को उठाना पड़ेगा , चाहे आप चर्च जाते हों या न जाते हों , चाहे आप किताबी हों या एथिस्ट ।

उसी प्रकार मैं तुर्की और इजिप्ट के बारे में बता रहा हूँ वहाँ के सभी सुदूर गाँव वहाँ के इमाम , मौलवी और काजी के अधीन हैं । उनका उस क्षेत्र के सभी संसाधनों पर अधिकार है और वे ही क़ानून हैं ।

जैसे ग़ाज़ीपुर का अंसारी है , ठीक वही मॉडल किसी की चूँ करने की औक़ात नहीं है ।

19 वीं सदी में जो काम मैकाले ने किया , वहीं काम 1947 के बाद नेहरू ने किया की भारत में आर्थिक रूप से विपन्न परन्तु मेधा शक्ति से सम्पन्न ब्राह्मणों को सनातन धर्म से अलग कर दो । ब्राह्मण , सदियों से सनातन धर्म के उस इकोसिस्टम को क्षत्रियों वैश्यों और शूद्रों की सहायता से बचाए हुए थे जिसके बाहर आने पर या तो सदैव के लिए आसमानी किताब के गिरफ़्त में जाइए या वामपंथ के चंगुल में, पर नाश होना अवश्यमभावी है ।

रही बात धर्म की तो यह सच्चाई है की पिछले सत्तर वर्षों में हमने धर्म को रिलीजन और मज़हब का पर्याय बना दिया है । पर यह तय मान लें संख्या बल में कम रहकर भी हम उस दीपक को नहीं बुझने देंगे जो हमारे वैदिक ऋषियों ने प्रज्वलित करी है ।

किसी दिन आप लोगों को trust का रहस्य भी समझाऊँगा की कैसे चर्च ने फ़ाइनैन्सियल इन्स्टीट्यूशन पर क़ब्ज़ा किया हुआ है और उसका विकल्प क्या है ।
✍🏻राज शेखर

आइये आपको एक बड़ा सा झूठ सुनाते हैं | बरसों से सुनते आ रहे होंगे, एक बार फिर से मेरा दोहराना भी जरूरी है | आखिर समाज में मेरा भी तो योगदान बनता है !! वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म में होती है | इसाई में नहीं होती, मुस्लिम भी नहीं मानते, मतलब कुल मिला के ये पाप सिर्फ़ हम लोग ही करते है |

Knight in a shining armor सुना होगा शायद, तो भाई हर सिपाही Knight नहीं हो सकता था, उसके लिए पैदा होना पड़ता है एक ख़ास वंश में | अपनी वंशावली के दस्तावेज दिखाने पड़ते थे अगर किसी भी Tournament में हिस्सा लेना हो या युद्ध में सबसे आगे खड़ा होना हो तो | दस्तावेज कुछ वैसे ही होते थे जैसे आपने कभी गया, या बनारस, या फिर प्रयाग के ब्राम्हणों के वंशावली वाले दस्तावेज देखे होंगे |

इसके अलावा अमीर लोगों को, जमींदारों को Noble Man भी कहा जाता था, अगर आप सोच रहे हैं की अमीर होना एक मात्र शर्त थी Noble होने की तो आप फिर से गलत हैं | यहूदी कभी भी noble नहीं होता था, चाहे फिर वो King Richard को उधार / क़र्ज़ देता हो या फिर King William को इस से फ़र्क नहीं पड़ता | यहूदी अछूत और इसाई न्याय का हकदार नहीं होता था | अगर शक्स्पिअर की Merchant of Venice वाला Shylock याद हो तो आपको पता है की यहूदियों के साथ कैसा व्यवहार होता था | अगर कहीं Rebecca नाम सुना है और Walter Scott की लिखी Ivanhoe जैसी किताबें पढ़ी हैं तो आप अच्छे से जानते हैं की मैं क्या बात कर रहा हूँ |

कांग्रेस ने कई अलग अलग यूनिवर्सिटी / बोर्ड बनाये थे और ICSE या CBSE बोर्ड के छात्रों ने ये किताबें शायद पढ़ रखी होंगी |

अब जरा निचले स्तर पर आते हैं, Fool वैसा ही होता था जैसे भारतीय समाज में भांड होते हैं, नाचने गाने, दिल बहलाने वाले, थोड़े विदूषक जैसे | किसान होते थे, जिनके पास कभी अपनी ज़मीन नहीं होती थी | चरवाहा होता था भेंड़ पालने के लिए, यही छोटे सिपाही होते थे | Page वो बच्चे होते थे जिन्हें चिट्ठियां पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, बाद में इनमे से कुछ का promotion कर के उन्हें मंत्री भी बनाया जाता था | एक Squire होता था, ये knight के सहयोगी होते थे, knight नहीं बन पाते थे लेकिन सामान्य सिपाहियों से ज्यादा सम्मानित होते थे |

अभी भी शायद आप कहना चाहेंगे की इनपे धर्म की मुहर नहीं होती थी | ये एक सामाजिक व्यवस्था है जैसी बातें आपके मन में आ रही होंगी | तो आपको फ्रांस की Joan of Arc की कहानी देखनी चाहिए | ये महिला तलवार उठा कर स्वतंत्रता संग्राम में लड़ी थी और इसे चर्च ने सलीब पे टांग के जला दिया था | इनपर इल्ज़ाम था की वो डायन है, क्योंकि उनके छूते ही घाव ठीक हो जाते हैं | उस ज़माने में Witch Hunt की लम्बी प्रक्रिया चली थी | अभी हाल में चर्च ने इन हरकतों के लिए माफ़ी मांगी है | इनके बारे में मगर बात करना पाप है | स्त्रियों को इसाई धर्म में समानता का अधिकार है | वोट देने का अधिकार ज्यादातर इसाई मुल्कों में महिलाओं को भारत के बाद मिला ये अलग बात है |

धर्म की मुहर वैज्ञानिक खोजों पर भी लगी है, चार्ल्स डार्विन की क़िताब उनकी ही यूनिवर्सिटी में प्रतिबंधित थी और गलीलियो को घोड़ों से बाँध कर उसके चार टुकड़े कर दिए गए थे |

ध्यान रहे भारतीय धर्म पिछड़े हैं और पाश्चात्य प्रगतिशील !!!
✍🏻आनन्द कुमार

1 यूरोप मे 19 वीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व कभी भी कोई राष्ट्र राज्य नहीं थे ।
2 यूरोप के किसी भी राष्ट्र राज्य को साम्राज्य संचालन का कोई अनुभव 2000 वर्षों मे एक बार भी नहीं था । पहली बार 19 वीं शतब्दी ईस्वी मे ही इसका अनुभव हुआ । इसीलिए उनका कोई भी साम्राज्य 150 -200 वर्षों से अधिक टिका ही नहीं ।
3 भारत मे सैकड़ों साम्राज्य शताब्दियों से रहे हैं और एक एक कुल को 600 से 1000 वर्षों तक साम्राज्य संचालन का अनुभव रहा है ।
4 18 वीं शतब्दी के आरंभ मे इंग्लैंड 20 राज्यों मे बंटा था ।
5 बड़े राज्य पहली बार अंग्रेजों और अन्य यूरोपीय राज्यों ने भारत मे ही देखे । यूरोप के राज्य 18 वीं -19वीं शतब्दी मे स्वयम आपस मे वैज्ञानिक जानकारियों की चोरियाँ करते थे ,इस पर अनेक पुस्तकें हैं जिनमे अभिलेखीय साक्ष्य हैं । परस्पर कड़ाई से गोपनीयता बरतते थे ।
7 इसलिए उन्होने भारत से जो सीखा उसका उल्लेख नहीं किया क्योंकि ईसाइयत कृतज्ञता नहीं सिखाती ।
7 16 वीं शतब्दी ईस्वी मे सैकड़ों यूरोपीय लोग भारत के राजाओं के यहाँ सिपाही की नौकरी के लिए आए थे । वास्कोडिगामा जब भारत आय तो उसने देखा कि अलग अलग राजाओं के यहाँ सैकड़ों यूरोपीय सिपाही नौकरी कर रहे हैं और बहुत सुखी हैं । ये लोग यूरोप मे अपने अपने देश जाके यहाँ सीखी शस्त्र विद्या सिखाते थे ।
8 भारत से अनेक वैज्ञानिक पुस्तकें ले जायी गईं । लूट के माल से साधन होने पर उन पर बड़ी मेहनत और तपस्या से कार्य हुआ । जर्मनी और इंग्लैंड फ़्रांस ने इन का खूब इस्तेमाल किया ।
9 ईसाइयों को भारत से मिली जानकारी के बाद बड़े राज्य की लिप्सा जागी । पहले उन्हे परस्पर खूनी लड़ाइयों का ही अभ्यास था , उनके मेधावी लोगों ने राज्य कौशल सीखा ।
10 भारत के नीचतम लोगों से ( यह इंग्लैंड की संसद के शब्द हैं ) ईस्ट इंडिया कंपनी ने छल कपट के साथ आपसी फूट का लाभ उठाना सीखा । उस से इंग्लैंड के लोग पहले घृणा करते थे पर जब यहाँ से खूब धन गया तो लोभ जागा । एडम स्मिथ ने The wealth of Nations पुस्तक लिखकर लूट को ईश्वरीय इच्छा बताया और उचित ठहराया । वह अर्थशास्त्र की मूल पुस्तक वहाँ हुयी ।
11 फिर भी उनके प्रबुद्ध लोगों ने भारत से बहुत कुछ सीखा और राज्यशास्त्र सीखा । इसीलिए 90 वर्ष टिके । जब भारतीयों ने उनका खेल समझा तो उखाड़ फेंका । इसमे सशस्त्र और शांतिपूर्ण दोनों मार्ग कुशलता से अपनाए गए ।
12 उन्होने शिक्षा का महत्व भारत से सीखा और फिर भारत की शिक्षा को जड़ मूल से नष्ट कर अपनी शिक्षा आरोपित की ।
13 इस से उन्हे बहुत लाभ हुआ । उनके अनेक शिष्य तैयार हुये । उनमे सबसे वफादार पर अपने सिर का भार अपनी शर्तों पर डाल कर वे गए ।
14 उनके शिष्यों मे सबसे होशियार और कुटिल जवाहर लाल नेहरू थे । उन्होने उनसे गद्दी तो ली पर फिर सोवियट संघ से सीख कर भयंकर आततायी तंत्र रचने की दिशा मे होशियारी से चले । इसीलिए वे मारे नहीं गए
15 उनकी चालाकी को पहचान कर सोवियट संघ ने अपने एजेंट यहाँ भर दिये ।
16 इस दुर्बल शासक समूह को देखकर यूरोप अमेरिका की अनेक शक्तियाँ यहाँ सक्रिय हो गईं ।
17 इस बीच भारतीयों का सबसे अनैतिक और चालाक वर्ग राजनीति मे छा गया और हर दल मे पैठ बना ली ।
18 शेष साधारण राजनैतिक कार्यकर्ताओं को भाव प्रधान बना कर रखा जाने लगा और उनसे शूद्रवत सेवा कार्य लिए जाने लगे और कुछ टुकड़े दिये जाने लगे ।

इसके लिए जिन छल रूपों का सहारा लिया गया , उनकी चर्चा आगे होगी ।

भारतीय इतिहास के विषय में यूरोपीयों को प्रमाण मानने की मूढ़ता:1

यूरोपियों को स्वयं अपने ही यूरोपीय अतीत का कोई भी प्रमाणिक ज्ञान नहीं है क्योंकि 19वीं सदी से पहले वहाँ इतिहास लेखन की कोई परंपरा नहीं रही है। सच तो यह है कि वहाँ विद्या की कोई प्राचीन परंपरा शेष है ही नहीं, जैसा प्रख्यात अध्येता प्रोफ़ेसर कुसुमलता केडिया जी ने बारंबार सप्रमाण कहा और बताया है…
अतः स्वयं यूरोप के प्राचीन इतिहास का कोई प्रामाणिक ज्ञान यूरोप में नहीं रहा है.
विश्व के अन्य भूभागों की तो उन्हें 19वीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व कोई गहरी और व्यापक जानकारी रही ही नहीं क्योंकि 16वीं शताब्दी ईस्वी से वह दुनिया में केवल इसी तरह खाने कमाने का साधन जुटाने अथवा मौका लगे तो लूटपाट करने के लिए ही निकले थे।
उस समय उन्हें न तो कोई जिज्ञासा थी और ना ही कोई उनमें अध्ययन की सामर्थ्य थी।
केवल यूरोप की कंगाली और भुखमरी तथा महामारी से बचकर दूर कहीं जाने और हो सके तो वहाँ से कुछ जोड़ या लूट कर अपने अपने इलाके में थोड़ा सम्मानित जीवन जीने की जुगाड़ करना ही उनके जीवन का उद्देश्य था और इसके लिए भी उन्हें अपने स्थानीय राजाओं को कमीशन देना होता था। जिसके प्रमाण भरे पड़े हैं।

भारतीय इतिहास के विषय में यूरोपीयों को प्रमाण मानने की मूर्खता:2

तथाकथित अध्ययन जो शुरू हुआ वह 19वीं शताब्दी में ही शुरू हुआ है। इसलिए विश्व के अतीत के इतिहास के विषय में कोई भी यूरोपीय विद्वान कुछ भी कहे तो वह अटकल पच्चू मात्र है क्योंकि वह उस विषय में अधिकारी है ही नहीं।
यूरोप के 15 सौ वर्षों का वे कुछ कुछ अनुमान लगाते हैं परंतु विश्व के विषय में अतीत का कोई भी ज्ञान कर पाना उनकी सामर्थ्य से बाहर की चीज है।
भारत में राजाओं के संपर्क में आने के बाद उन्हें अपने इस भीषण अज्ञान और इतिहास के अभाव का गहरा बोध हुआ क्योंकि यहाँ उन्होंने पाया कि इतिहास का विस्तृत ज्ञान भारत के लोगों को है।
तब उनमें से कुछ ने भारतीयों से पूछ पूछ कर यहाँ के राजाओं की कृपा पूर्ण अनुमति प्राप्त कर कुछ तथ्य जुटाने की मेहनत की क्योंकि न तो वे यहाँ की भाषा जानते थे और ना ही यहाँ के लोगों का उच्चारण पूरी तरह उन्हें समझ में आता था।
स्पष्ट है कि उन्होंने जो कुछ भी बहुत मेहनत के साथ संकलित किया वह आनुषंगिक और सेकेंडरी स्रोत है प्राथमिक नहीं। अतः जो कोई नव शिक्षित भारतीय, भारत के अतीत की यानी 16वीं शताब्दी ईस्वी से पहले की किसी भी घटना पर किसी यूरोपीय को उद्धृत करता है या उसके लिखे को आधार बनाता है तो इससे वह भारतीय स्वयं के विद्या विहीन होने का ही प्रमाण देता है।
वह अविचारणीय विषय पर समय नष्ट कर रहा होता है। क्योंकि यह तो ऐसा ही है जैसे आइन्स्टाइन के वैज्ञानिक ज्ञान पर नौवीं कक्षा का कोई भारतीय ग्रामीण छात्र कुछ लिखे और दावा करे कि सत्य यही है, ना कि उस विषय के शीर्ष वैज्ञानिकों के कथन सत्य हैं।
भारत के विषय में यूरोपीय लोगों के कथन ठीक इसी प्रकार के हैं जैसे शीर्ष विज्ञान के विषय में भारत के किसी गाँव का नौवीं कक्षा का विद्यार्थी कुछ कहे।
ज्ञान के निकष सार्वभौम होते हैं और भारत के लोगों को उस ज्ञान की सामर्थ्य से रहित मानकर चलना, जिस ज्ञान के वे लाखों बरसों से विशेषज्ञ हैं, और नौसिखुआ परदेशी को उसमे समर्थ मान लेना, यह ऐसा मानने वाले की बौद्धिक दयनीयता ही दर्शाता है।।
✍🏻प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

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