मिडिया ट्रायल से बकरीद पर गौरक्षा हो सकती है।

बहुत से पत्रकारों, मिडिया वालों को अनेक गौभक्त संपर्क कर सकते हैं। वैसे तो, मिडिया वाले सारी खबर रखते हैं, किंतु यह भी सत्य है कि कोई सर्वज्ञ नहीं है। अतः हो सकता है कि दिल्ली में बैठे मीडिया वालों को यह जानकारी न हो कि :-
1) बकरीद पर गौवंश की कुर्बानी करना, कुर्बानी का प्रयास करना भी गैर कानूनी है। अर्थात रखना, लाना, ले जाना, खरीदना-बेचना, बाजार लगाना भी गैर कानूनी है। जो खुले आम हो रहा है। बंगाल सरकार चिडियाखाना के पास स्वयं बाजार लगाती थी। न्यायधीश ने पूछा सरकार कैसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन करते हुए बकरीद पर गौ का बाजार लगा सकती है? उस आदेश के बाद वह बाजार बंद हो गया।
2) गौवंश की कुर्बानी, संविधान के किस अनुच्छेद का + प बंगाल पशु हत्या नियंत्रण आदेश 1950, एवं पशु क्रूरता निवारक अधिनियम 1960 के किस धारा का उल्लंघन है?
3) सर्वोच्च न्यायालय का आदेश दिनांक 16-11-94 न पढ़ा हो। (1995 एआईआर पृष्ठ 464) जिसके अनुसार गौ की कुर्बानी करना आवश्यक धार्मिक कृत्य नहीं, अतः गैर कानूनी है।
4) बंगाल में बड़ी संख्या में मुस्लिम बहुल इलाकों में गोवंश की गैर कानूनी कुर्बानी व कुर्बानी का प्रयास, खुले आम हो रहा है।
5) पुलिस को मूक दर्शक बने रहने या अपराधियों को कुर्बानी हेतु गोवंश लाने – ले जाने में बाधा न हो, इसका ध्यान रखने का आदेश दिया जाता है।
6) जनतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया, बाकी तीनों को सीधे संपर्क कर सकता है, डिबेट करा सकता है, गोधन की रक्षा करने के उन्हें कर्तव्य का बोध करा सकता है, जनता को जगा सकता है।
7) कलकत्ता में बैठे अपने संवाददाता को सक्रिय करने कह सकता है।
8) मुस्लिम बहुल इलाकों का दौरा कर, गायों की दुर्दशा का चित्र ले, भारत भर में दिखा सकता है।
9) बाबर से बहादुर शाह जफर तक के मुगल काल में गोवंश की कुर्बानी करने वाले को मृत्यु दंड देने, तोप से उड़ाने का प्रावधान था
10) अंग्रेजों ने भारत को गरीब और गुलाम बनाने के लिए, कत्लखाने खोल कर, गोधन का नाश कराया। कत्लखानों में केवल मुसलमानों को जबरदस्ती भर्ती कर, गोवध करा, हिंदू – मुसलमानों को लड़ा, बांटो और राज करो की नीति के अंतर्गत भारत पर राज किया और जाते जाते भारत के तीन टुकड़े कर उसे अपंग + कमजोर बना दिया।
11) अंग्रेजों से आजादी का प्रयास, गौ की चर्बी लगे कारतूसों को न छूने के, मंगल पांडे के निश्चय से शुरू हुआ। आजादी के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले सभी स्वतंत्रता सेनानियों का मत था कि देश आजाद होते ही गौरक्षा हो जायेगी। किंतु अंग्रेज मानसिकता से ग्रस्त काले अंग्रेजों द्वारा शाशन होने से यह नहीं हुआ।
12) कत्लखाने, तस्करी और मांस निर्यात बंद हो जाये तो भारत सोने का शेर और अखंड बन सकता है।
13) कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि सरकार, न्यायालय के आदेशों का प्रिंट और विजुअल मीडिया में विज्ञापन दे। विज्ञापन पाने से मिडिया वालों को बहुत लाभ होगा।
14) इंडिया टीवी, जी टीवी, सुदर्शन टीवी जैसे कुछ देशभक्त चैनलों के सक्रिय होने से गौरक्षा हो सकती है।
15) अनेक गौभक्त अपना शोशल मीडिया चला, हजारों-लाखों लोगों से जुड़े हैं। वे उपरोक्त कदम उठा, गौरक्षा कर, गर्व महसूस कर सकते हैं।
16) मोहम्मद साहब ने कहा था कि गाय का दूध दही घी शिफा = दवा है और गोमांस बीमारी है। इसीकारण मुसलमान गोमांस से परहेज करते हैं।

निवेदन है कि कृपया सब गौभक्त प्रयास करें + सबको अग्रेषित करें, हो सकता है कि कोई मीडिया को सक्रिय कर सके – सुदर्शन, कलकत्ता : 9433023999

प्रतिभा प्रलाप नहीं करती प्रयास करती है…..!!

22 वर्षीय युवा एक माह में 28 दिन विदेश यात्रा करता हैं। फ्रांस ने उसे अपने यहां नौकरी करने के लिए आमंत्रित किया, जिसमें उसे 16,00,000(सोलह लाख) रुपए प्रतिमाह वेतन, 5 बीएचके मकान और ढाई करोड़ की कार देने का प्रस्ताव दिया गया। परंतु उसने यह बड़ी ही विनम्रता से अस्वीकार कर दिया ,क्योंकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) को उसका संविलियन करने के आदेश दे दिए गए थे ।

आइए, वह बालक कौन है इसके बारे में हम जानें-
भाग एक-
मैसूर
कर्नाटक के निकट दूरस्थ ग्रामीण अंचल में कदईकड़ी में जन्मा बालक‌ ।
पिता कृषक ।पिता की आय महज 2000 रुपये मासिक। बचपन से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रति रुचि। प्राथमिक कक्षा से ही निकट के साइबरकेफे में जाता और दुनिया भर की एविएशन स्पेस वेबसाइट में डूबा रहता।
टूटी फूटी भाषा में वैज्ञानिकों को ई मेल भेजता। वह इंजीनियरिंग करना चाहता था पर आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण बीएससी भौतिक करना पड़ा। छात्रावास शुल्क अदा न करने के कारण उसे वहां से निकाला गया।

वह मैसूर बस स्टैंड पर सोता और सार्वजनिक टॉयलेट का उपयोग करता।

उसने अपनी मेहनत से कंप्यूटर लैंग्वेज का ज्ञान प्राप्त किया और ई वेस्ट के माध्यम से ड्रोन बनाना सिखा।
अभी तक 600 से ज्यादा ड्रोन बना चुके इस बालक को पहला ड्रोन बनाने के लिए 80 बार प्रयत्न करना पड़ा।

भाग दो –
IIT दिल्ली में ड्रोन प्रतियोगिता में भाग लेने ट्रेन के जनरल क्लास में गया
और द्वितीय स्थान प्राप्त किया।

जापान में आयोजित विश्व ड्रोन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उसे अपनी थीसिस चेन्नई के प्रोफ़ेसर से अनुमोदित कराना पड़ा, जिसे यह लिखने में दक्ष नहीं है टिप्पणी के साथ अनुमोदित कर दिया गया।
जापान जाने के लिए ₹60000 रुपयों की

जरूरत थी, जिसे मैसूर के एक व्यक्ति द्वारा उसके फ्लाइट टिकट स्पॉन्सर किए गए। ऊपरी खर्च के लिए उसने अपनी मां का मंगलसूत्र बेचकर व्यवस्था की। जब वह जापान उतरा तो उसकी जेब में मात्र 14 सौ रुपए थे। आयोजन स्थल तक जाने के लिए मंहगी बुलेट ट्रेन से टिकट ले पाना संभव नहीं

था। 16 स्थानों पर लोकल ट्रेन बदलते बदलते और अंत के 8 किलोमीटर पैदल चलते हुए वह आयोजन स्थल पर पहुंचा जहां 127 देशों के प्रतियोगी भाग ले रहे थे।
जब परिणाम घोषित किया जा रहा था तो उसमें टॉप टेन के 10 वें नंबर से 2 तक उसका नाम नहीं आया तो वह निराश होकर वापस हो रहा था…
..तभी जज ने घोषित किया प्रताप गोल्ड मेडलिस्ट भारत। वह खुशी से उछल पड़ा। उसने अपनी आंखों से यूएसए का ध्वज नीचे उतरते और भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ऊपर जाते हुए देखा। पुरस्कार स्वरुप उसे 10,000 डॉलर प्रदान किए गए। *भारतीय प्रधानमंत्री और कर्नाटक के विधायक और सांसदों ने भी उसे बधाइयां दी। आज यह प्रतिभाशाली बालक रक्षा अनुसंधान और रक्षा विकास संगठन में वैज्ञानिक के पद पर सेवारत है!*

प्रतिभा प्रलाप नहीं करती प्रयास करती है और प्रतिष्ठा अर्जित करती है। पैसा जरुरी है पर Passion उससे भी ज्यादा जरुरी! 🇮🇳🚩🇮🇳

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर चिकित्सा सहायता योजना एमके

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जाति (अनुसूचित जनजाति) के रोगियों के लिए डॉ.अम्बेडकर फाउंडेशन 15, जनपथ, नई दिल्ली 110001
1) हार्ट सर्जरी के लिए 1.25 लाख रुपये।
2) किडनी की सर्जरी के लिए 3.5 लाख रुपये।
3) कैंसर, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के लिए 1.75 लाख रुपये।
4) ब्रेन सर्जरी के लिए 1.5 लाख रुपये।
5) किडनी या अंग प्रत्यारोपण के लिए 3.5 लाख रुपये।
6) स्पाइनल सर्जरी के लिए 1.00 लाख रु
अन्य घातक बीमारियों के लिए 1.00 लाख।
ऐसी वित्तीय सहायता उपलब्ध है। इस मदद के लिए
1) रोगी एससी (एससी) या एसटी (एसटी) होना चाहिए
2) वार्षिक आय 3 लाख रुपये है।
आवेदन करते समय निम्नलिखित प्रमाणपत्रों को शामिल किया जाना चाहिए
1) पूरा आवेदन पत्र।
2) आय का प्रमाण।
3) जाति प्रमाण पत्र।
4) राशन कार्ड।
5) आधार कार्ड।
6) चिकित्सा अधीक्षक द्वारा प्रमाणित प्रमाण पत्र
इस परियोजना को प्राप्त करने के लिए निदेशक डॉ. अम्बेडकर फाउंडेशन, नई दिल्ली दिल्ली-११०००१।
अधिक जानकारी के लिए सर्जरी से 15 दिन पहले इस पते पर आवेदन करना अनिवार्य है
011-23320571,
011-23320589, या आप कार्यालय समय के दौरान हमसे संपर्क कर सकते हैं
विस्तृत जानकारी के लिए http://www.drambedkarfoundation.nic.in पर जाएं और फॉर्म डाउनलोड करें।

जय भीम!
बुद्धं नमामि!
धम्मं नमामि !!
सघं नमामि !!!
कृपया इसे ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में शेयर करें जिससे हमारे प्यारे भाइयों और बहनों को फायदा होगा !

डा० बी पी राव
जय भीम! जय अम्बेडकरवाद!

🌹🌱- मन – दिमाग को शक्तिशाली बनाने वाला भोजन 🌹🌷🌿🍀🍑🌱🌿🍏

  • 🌹हल्दी 🌹
  • इस में कुरकुमीन रसायन होता है  जो कैंसर का इलाज करता है ।

-हल्दी दिमाग की क्षतिग्रस्त और  मरी  हुई कोशिकाओं  की  रिपेयर  करती है । जिस से दिमाग शक्तिशाली और तेज  बन जाता है ।

  • आधा  चमच हल्दी दूध  में मिला कर पी  जाएं  ।  हर रोज़ नहीं हफ्ते में  एक दिन  लेनी चाहिये क्योंकि ये गर्म होती है ।
    🌹जायफल ( nutmeg )

–इस का सेवन शरीर एवं दिमाग के लिये सही है ।

-इस के खाने  से कभी अलजाईमर (  भूलने ) की बीमारी नहीं होगी । यह दिमाग को बहुत तेज बनाता  है ।

-यह गर्म होता है, बहुत कम  मात्रा में सेवन करें । आधा ग्राम से एक ( 1 ) ग्राम से ज्यादा न  ले । इसे रात को  दूध  के साथ लेने से नींद भी  बहुत  अच्छी  आयेगी ।

-इसे घी या शहद के साथ नाश्ते के बाद लेना सबसे उत्तम है । अगर आप इसे मसाले में उपयोग कर रहे है तो अलग से लेने की जरूरत नहीं है । -🌹केसर 🌹

  • रात को सोने से पहले दूध  में चुटकी  भर मरीन  केसर का इस्तेमाल करके अनिँद्रा और डिप्रेशन तथा  क्रोध से छुटकारा  पा सकते है ।

-इस से यादाश्त  और  सीखने की क्षमता बढ़ती है । इसमे मैजूद  तत्व अवसाद से बाहर निकालते हैं ।

  • 🌹काली मिर्च 🌹

-इस में पाया जाने वाला रसायन शरीर और दिमाग की कोशिकाओं को आराम देता  है । इस के प्रयोग से डिप्रेशन दूर होता है । जिस से दिमाग शक्तिशाली  बनता है ।

-काली मिर्च अधिक से अधिक प्रयोग करनी चाहिये । 🌹मेगनीशियम🌹 (magnesium  )

-ऐसा  भोजन जिस में मेगनीशियम ज्यादा होता है वह प्रयोग करें ।  इस से सेरोटोनिन रसायन बनता  है जिस से खुशी बढ़ती है ।

-मेगनीशियम  डार्क चाकलेट और बादाम में मिलता है ।

-🌹5 बादाम रात को भिगो कर रख दो । सुबह उसका पानी पी जाये । इस से दिमाग तेज होता है । 🌹दूध🌹

-🌹गर्म दूध  पीने से सेराटोनिन हार्मोन बनता है जिस से दिमाग  🌱को आराम मिलता है ।

-दूध  में शहद मिला  कर पीने से यादाशत बढ़ती है । अगर गाय का दूध  हो तो और अच्छा  होगा ।🌿Nanulal Prajapati 🌹

क्या आप जानते हैं कि हमारे देश व शहरों के असली नाम क्या थे ?

🪔१. हिन्दुस्तान, इंडिया या भारत का असली नाम – आर्यावर्त्त !
🪔२. कानपुर का असली नाम – कान्हापुर !
🪔३. दिल्ली का असली नाम – इन्द्रप्रस्थ !
🪔४. हैदराबाद का असली नाम – भाग्यनगर !
🪔५. इलाहाबाद का असली नाम – प्रयाग !
🪔६. औरंगाबाद का असली नाम – संभाजी नगर !
🪔७. भोपाल का असली नाम – भोजपाल !
🪔८. लखनऊ का असली नाम – लक्ष्मणपुरी !
🪔९. अहमदाबाद का असली नाम – कर्णावती !
🪔१०. फैजाबाद का असली नाम – अवध !
🪔११. अलीगढ़ का असली नाम – हरिगढ़ !
🪔१२. मिराज का असली नाम – शिव प्रदेश !
🪔१३. मुजफ्फरनगर का असली नाम – लक्ष्मी नगर !
🪔१४. शामली का असली नाम – श्यामली !
🪔१५. रोहतक का असली नाम – रोहितासपुर !
🪔१६. पोरबंदर का असली नाम – सुदामापुरी !
🪔१७. पटना का असली नाम – पाटलीपुत्र !
🪔१८. नांदेड का असली नाम – नंदीग्राम !
🪔१९. आजमगढ का असली नाम – आर्यगढ़ !
🪔२०. अजमेर का असली नाम – अजयमेरु !
🪔२१. उज्जैन का असली नाम – अवंतिका !
🪔२२. जमशेदपुर का असली नाम काली माटी !
🪔२३. विशाखापट्टनम का असली नाम – विजात्रापश्म !
🪔२४. गुवाहटी का असली नाम – गौहाटी !
🪔२५. सुल्तानगँज का असली नाम – चम्पानगरी !
🪔२६. बुरहानपुर का असली नाम – ब्रह्मपुर !
🪔२७. इंदौर का असली नाम – इंदुर !
🪔२८. नशरुलागंज का असली नाम – भीरुंदा !
🪔२९. सोनीपत का असली नाम – स्वर्णप्रस्थ !
🪔३०. पानीपत का असली नाम – पर्णप्रस्थ !
🪔३१.बागपत का असली नाम – बागप्रस्थ !
🪔३२. उसामानाबाद का असली नाम – धाराशिव (महाराष्ट्र में) !
🪔३३. देवरिया का असली नाम – देवपुरी ! (उत्तर प्रदेश में)
🪔३४. सुल्तानपुर का असली नाम – कुशभवनपुर
🪔३५. लखीमपुर का असली नाम – लक्ष्मीपुर ! (उत्तर प्रदेश में)
🪔३६. मुरैना का असली नाम – मयुरवन….

🪔यह सभी नाम मुगलों व अंग्रेजों द्वारा बदले गये हैं।

🪔लेख को पढ़ने के उपरांत अन्य समूहों में साझा अवश्य करें।

🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

अंग्रेजों ने नष्ट की भारत की उन्नत चिकित्सा व्यवस्था / १

विनाशपर्व


लेखक:- प्रशांत पोळ

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है. विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय, तक्षशिला, भारत में था. ईसा के लगभग एक हजार वर्ष पहले यह प्रारंभ हुआ और ईसा के बाद, पांचवी शताब्दी में हुणों के आक्रमण के कारण बंद हुआ. इस विश्वविद्यालय में ‘चिकित्सा विज्ञान’ का व्यवस्थित पाठ्यक्रम था. आज से, लगभग २७०० वर्ष पहले, दुनिया को शरीर शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र और औषधी विज्ञान के बारे में हम सुव्यवस्थित ज्ञान दे रहे थे. अर्थात भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत थी और नीचे तक पहुंची थी, इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं.

कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ इस ग्रंथ मे, पालतू पशु और उनकी देख रेख के संदर्भ में जानकारी दी गई हैं. सम्राट अशोक के कार्यकाल में, अर्थात ईसा से २७३ वर्ष पहले, विशाल फैले हुए भारतवर्ष में अस्पतालों का जाल था. जी हां ! अस्पताल थे और मनुष्यों के साथ जानवरों के थे, इसके प्रमाण मिले हैं. वर्तमान में भारतीय पशु चिकित्सा परिषद (Veterinary Council of India) का जो लोगो या बैज (सम्मानचिन्ह) हैं, उस में सम्राट अशोक के काल के बैल और पत्थर के शिलालेख को अपनाया हैं.

संयोग ये था, कि जब तक्षशिला विश्वविद्यालय बंद हुआ, उसी के आसपास विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय प्रारंभ हुआ. इसमें भी ‘चिकित्सा विज्ञान’ का पाठ्यक्रम था, और अनेक विद्यार्थी इस पाठ्यक्रम को पढकर, पारंगत होकर अपने अपने गांव जाकर चिकित्सा करते थे. किंतू इसके अलावा, पूरे भारतवर्ष में गुरुकुल व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत भी चिकित्सा विज्ञान अर्थात आयुर्वेद पढाया जाता था.

चरक संहिता यह चिकित्सा शास्त्र पर आधारभूत समझा जाने वाला प्राचीन ग्रंथ है. इसके रचना की निश्चित तिथी की जानकारी नहीं है. पर यह साधारण ईसा से पहले सौ वर्ष और ईसा के बाद दो सौ वर्ष के कालखंड में लिखा गया होगा, ऐसा अनुमान है. अर्थात मोटे तौर पर दो हजार वर्ष पुराना ग्रंथ है.

देश के कोने कोने में चिकित्सा करने वाले वैद्यों के लिये यह ग्रंथ, बाकी अन्य ग्रंथों के साथ, प्रमाण ग्रंथ था. यह ग्रंथ, ‘विद्यार्थी कैसा हो, चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य क्या है, कौन से ग्रंथों का ‘संदर्भ ग्रंथ’ के नाते उपयोग करना चाहिये’… ऐसी अनेक बातें बताता है. आज के चिकित्सा शास्त्र के लगभग सारे विषय इस ग्रंथ में सम्मिलित हैं. आज का चिकित्सा शास्त्र जिन विधाओं की बात करता है, उसमें से अधिकतम विधाओं की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक में है. जैसे – Pathology, Pharmaceutical, Toxicology, Anatomy आदि.

इस्लामी आक्रांता आने तक तो देश में चिकित्सा व्यवस्था अच्छी थी. औषधी शास्त्र में भी नये नये प्रयोग होते थे. आयुर्वेद के पुराने ग्रंथों पर भाष्य लिखे जाते थे और नये सुधारों को उनमें जोडा जाता था.

किंतू इस्लामी आक्रांताओं ने इस व्यवस्था को ही छिन्न भिन्न किया. नालंदा के साथ सभी विश्वविद्यालय और बडी बडी पाठशालाएँ नष्ट कर दी गईं. उसमें उपलब्ध सारा ग्रंथसंग्रह जला दिया गया. किंतू फिर भी अपने यहां जो वाचिक परंपरा है, उसके माध्यम से चिकित्सा विज्ञान का यह ज्ञान पिढी दर पिढी चलता रहा. इन आक्रांताओं के पास कोई वैकल्पिक चिकित्सा व्यवस्था नहीं थी. इसलिये उन्होंने भी इस क्षेत्र में कुछ नया थोंपने का प्रयास नहीं किया.

किंतू अंग्रेजों के साथ ऐसा नहीं था. सत्रहवीं शताब्दी से उन्होंने अपनी एक चिकित्सा व्यवस्था निर्माण करने का प्रयास किया था, जिसे एलोपॅथी कहा जाता था. इस एलोपॅथी के अलावा अन्य सभी चिकित्सा प्रणालियाँ दकियानूसी हैं ऐसा अंग्रेजों का दृढ विश्वास था. इसलिये उन्होंने भारत में, हजारों वर्ष पुराने आयुर्वेद को ‘अनपढ और गंवारों की चिकित्सा पद्धती’, बोलकर भारतीय समाज पर एलोपॅथी थोपी.

भारत में पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान पर आधारित पहला अस्पताल पोर्तुगीज लोगों ने बनाया, अंग्रेजों ने नही. सन् १५१२ में गोवा में, एशिया का एलॉपॅथी पर आधारित पहला अस्पताल प्रारंभ हुआ. इसका नाम था, ‘Hospital Real do Spiricto Santo’

१७५७ की प्लासी की लडाई जीतने के बाद, एक बडे भूभाग पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया. अपने प्रशासन के प्रारंभ से ही उन्होंने चिकित्सा विज्ञान की भारतीय पद्धती को हटा कर पाश्चात्य एलॉपेथी प्रारंभ की.

प्रारंभ में भारतीय नागरिकों ने इस पाश्चात्य व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया किंतु १८१८ में मराठों को परास्त कर, देश का प्रशासन संभालते समय और बाद में १८५७ के स्वातंत्र्य युद्ध की समाप्ती के बाद, पाश्चात्य चिकित्सा व्यवस्था को जबरदस्ती लागू किया गया.

अंग्रेजों का पहला जहाज भारत के सूरत शहर में पहुंचा २४ अगस्त १६०८ को. इसी जहाज से पहले ब्रिटिश डॉक्टर ने भारत की धरती पर पांव रखा. यह डॉक्टर, जहाज के डॉक्टर के रूप में अधिकारिक रूप से भारत की धरती पर आया था. अगले देढ सौ वर्षों तक जहां जहां अंग्रेजों की बसाहट थी, वहां वहां, अर्थात सूरत, बाँबे (मुंबई), मद्रास, कलकत्ता आदि स्थानों पर अंग्रेजी डॉक्टर्स / नर्स और छोटे मोटे अस्पतालों की रचना होती रही.

यह चित्र बदला सन् १७५७ में प्लासी के युद्ध के बाद, जब बंगाल के एक बहुत बडे प्रदेश की सत्ता अंग्रेजों के पास आई. अब उन्हें मात्र अंग्रेज लोगों की ही चिंता नहीं करनी थी, वरन् उनकी भाषा में ‘नेटिव्ह’ लोग भी उसमें शामिल थे. संक्षेप में संपूर्ण ‘प्रजा’ की, नागरिकों के स्वास्थ्य की उन्हें चिंता करनी थी. बंगाल में पहले चिकित्सा विभाग का गठन हुआ सन् १७६४ में. इसमें प्रारंभ से ४ प्रमुख शल्य चिकित्सक (सर्जन), ८ सहायक शल्य चिकित्सक और २८ सहायक थे. किन्तु दुर्भाग्य से, बंगाल में १७६९ से १७७१ के बीच जो भयानक सूखा पड़ा, उस समय अंग्रेजों की कोई चिकित्सा व्यवस्था मैदान में नहीं दिखी. इस अकाल में एक करोड़ से ज्यादा लोग भूख से और अपर्याप्त चिकित्सा की वजह से मारे गए. १७७५ में बंगाल के लिये हॉस्पिटल बोर्ड का गठन हुआ, जो नये अस्पतालों की मान्यता देखता था.

अगले १० वर्षों में अर्थात १७८५ तक अंग्रेजों की यह स्वास्थ्य सेवाएँ बंगाल के साथ मुंबई और मद्रास में भी प्रारंभ हो गई. इस समय तक कुल २३४ सर्जन्स अंग्रेजों के इलाकों में काम कर रहे थे. १७९६ में, हॉस्पिटल बोर्ड का नाम बदलकर ‘मेडिकल बोर्ड’ किया गया.

सन् १८१८ में मराठों को निर्णायक रूप से परास्त कर अंग्रेजों ने सही अर्थों में भारत में अपनी सत्ता कायम की. अब पूरे भारत में उनको अपनी चिकित्सा व्यवस्था फैलानी थी. उतने कुशल डॉक्टर्स और नर्सेस उनके पास नहीं थे. दूसरा भी एक भाग था. भारतीय जनमानस, अंग्रेजी डॉक्टर्स पर भरोसा करने तैयार नहीं था. उसे सदियों से चलती आ रही, सहज, सरल और सुलभ वैद्यकीय चिकित्सा प्रणाली पर ज्यादा विश्वास था. इसलिये अंग्रेजों ने पहला लक्ष्य रखा, भारतीय चिकित्सा पद्धती को ध्वस्त करना. इसकी वैधता के बारे में अनेकों प्रश्न खडे करना और इस पूरी व्यवस्था को दकियानूसी करार देना.

सन् १८५७ तक इतने बडे भारत पर ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ यह निजी कंपनी ही राज कर रही थी. १८५७ की, भारतीय सैनिकों की सशस्त्र क्रांती के बाद, सन् १८५८ से भारत के प्रशासन की बागडोर सीधे ब्रिटन की रानी के हाथ में आ गई. अब भारत पर ब्रिटन के हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के नियम चलने लगे.

भारतीय चिकित्सा प्रणाली, एक अत्यंत विकसित पद्धती थी. इन पश्चिम के डॉक्टर्स को जिसका अंदाज भी नहीं था, ऐसी ‘प्लास्टिक सर्जरी’ जैसी कठिन समझी जाने वाली शल्यक्रिया, भारतीय सैकडों वर्षों से करते आ रहे थे. अंग्रेजों ने भारत में यह चिकित्सा देखी, तो उसे वे इंग्लैंड ले गए. वहां से यह चिकित्सा पद्धती सारे यूरोप में और बाद में अमेरिका में भी फैली. अंग्रेजों को इस प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिलने का किस्सा बडा मजेदार हैं–

सन १७५७ में अंग्रेजों ने प्लासी की लड़ाई जीत कर, बंगाल और ओरिसा के बड़े भूभाग पर सत्ता कायम की थी. किन्तु, भारत जैसे विशाल देश में यह बहुत छोटा सा हिस्सा था. १८१८ में अंग्रेजों का कब्जा लगभग पूरे देश पर हो गया. इन बीच के ६१ वर्ष यह अंग्रेजों की कुटिल राजनीति के और उन्होने लड़े हुए युद्धों के हैं. इन दिनों अंग्रेज़ दक्षिण में हैदर – टीपू सुल्तान से, मराठों से और उत्तर में मराठों के सरदार शिंदे और होलकर से लड़ रहे थे.

भारत में हैदर – टीपू के साथ हुई लडाईयों में अंग्रेजों को दो नए आविष्कारों की जानकारी हुई. (अंग्रेजों ने ही यह लिख रखा हैं)

  1. युध्द में उपयोग किया हुआ रॉकेट और
  2. प्लास्टिक सर्जरी
    अंग्रेजों को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिलने का इतिहास बड़ा रोचक हैं. सन १७६९ से १७९९ तक, तीस वर्षों में, हैदर अली – टीपू सुलतान इन बाप-बेटे और अंग्रेजों में ४ बड़े युध्द हुए. इन मे से एक युध्द में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाला ‘कावसजी’ नाम का मराठा सैनिक और ४ तेलगु भाषी लोगों को टीपू सुलतान की फ़ौज ने पकड़ लिया. बाद में इन पाचों लोगों की नाक काटकर टीपू के सैनिकों ने, उनको अंग्रेजों के पास भेज दिया.

इस घटना के कुछ दिनों के बाद एक अंग्रेज कमांडर को एक भारतीय व्यापारी के नाक पर कुछ निशान दिखे. कमांडर ने उनको पूछा तो पता चला की उस व्यापारी ने कुछ ‘चरित्र के मामले में गलती’ की थी, इसलिए उसको नाक काटने की सजा मिली थी. लेकिन नाक कटने के बाद, उस व्यापारी ने एक वैद्य जी के पास जाकर अपना नाक पहले जैसा करवा लिया था. अंग्रेज कमांडर को यह सुनकर आश्चर्य लगा. कमांडर ने उस कुम्हार जाती के वैद्य को बुलाया और कावसजी और उसके साथ के चार लोगोंका नाक पहले जैसा करने के लिए कहा.

कमांडर की आज्ञा से, पुणे के पास के एक गांव में यह ऑपरेशन हुआ. इस ऑपरेशन के समय दो अंग्रेज डॉक्टर्स भी उपस्थित थे. उनके नाम थे – थॉमस क्रूसो और जेम्स फिंडले. इन दोनों डॉक्टरों ने, उस अज्ञात मराठी वैद्य ने किए हुए इस ऑपरेशन का विस्तृत समाचार ‘मद्रास गजेट’ में प्रकाशन के लिए भेजा. वह छपकर भी आया. विषय की नवीनता एवं रोचकता देखते हुए, यह समाचार इंग्लैंड पहुचा. लन्दन से प्रकाशित होने वाले ‘जेंटलमैन’ नामक पत्रिका ने इस समाचार को अगस्त, १७९४ के अंक में पुनः प्रकाशित किया. इस समाचार के साथ, ऑपरेशन के कुछ छायाचित्र भी दिए गए थे.

जेंटलमैन में प्रकाशित ‘स्टोरी’ से प्रेरणा लेकर इंग्लैंड के जे. सी. कॉर्प नाम के सर्जन ने इसी पध्दति से दो ऑपरेशन किये. दोनों सफल रहे. और फिर अंग्रेजों को और पश्चिम की ‘विकसित’ संस्कृति को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी मिली. पहले विश्व युध्द में इसी पध्दति से ऐसे ऑपरेशन्स बड़े पैमाने पर हुए और वह सफल भी रहे.

असल में प्लास्टिक सर्जरी से पश्चिमी जगत का परिचय इससे भी पुराना हैं. वह भी भारत की प्रेरणा से. ‘एडविन स्मिथ पापिरस’ ने पश्चिमी लोगों के बीच प्लास्टिक सर्जरी के बारे में सबसे पहले लिखा ऐसा माना जाता हैं. लेकिन रोमन ग्रंथों में इस प्रकार के ऑपरेशन का जिक्र एक हजार वर्ष पूर्व से मिलता हैं. अर्थात भारत में यह ऑपरेशन्स इससे बहुत पहले हुए थे. आज से पौने तीन हजार वर्ष पहले, ‘सुश्रुत’ नाम के शस्त्र-वैद्य (आयुर्वेदिक सर्जन) ने इसकी पूरी जानकारी दी हैं. नाक के इस ऑपरेशन की पूरी विधि सुश्रुत के ग्रंथ में मिलती हैं.

किसी विशिष्ठ वृक्ष का एक पत्ता लेकर उसे मरीज के नाक पर रखा जाता हैं. उस पत्ते को नाक के आकार का काटा जाता हैं. उसी नाप से गाल, माथा या फिर हाथ / पैर, जहां से भी सहजता से मिले, वहां से चमड़ी निकाली जाती हैं. उस चमड़ी पर विशेष प्रकार की दवाइयों का लेपन किया जाता हैं. फिर उस चमड़ी को जहां लगाना हैं, वहां बांधा जाता हैं. जहां से निकाली हुई हैं, वहां की चमड़ी और जहां लगाना हैं, वहां पर विशिष्ठ दवाइयों का लेपन किया जाता हैं. साधारणतः तीन हफ्ते बाद दोनों जगहों पर नई चमड़ी आती हैं, और इस प्रकार से चमड़ी का प्रत्यारोपण सफल हो जाता हैं. इसी प्रकार से उस अज्ञात वैद्य ने कावसजी पर नाक के प्रत्यारोपण का सफल ऑपरेशन किया था.

नाक, कान और होंठों को व्यवस्थित करने का तंत्र भारत में बहुत पहले से चलता आ रहा हैं. बीसवी शताब्दी के मध्य तक छेदे हुए कान में भारी गहने पहने के रीती थी. उसके वजन के कारण छेदी हुई जगह फटती थी. उसको ठीक करने के लिए गाल की चमड़ी निकाल कर वहां लगाई जाती थी. उन्नीसवी शताब्दी के अंत तक इस प्रकार के ऑपरेशन्स भारत में होते थे. हिमाचल प्रदेश का ‘कांगड़ा’ जिला तो इस प्रकार के ऑपरेशन्स के लिए मशहूर था. कांगड़ा यह शब्द ही ‘कान + गढ़ा’ ऐसे उच्चारण से तैयार हुआ हैं. डॉ. एस. सी. अलमस्त ने इस ‘कांगड़ा मॉडल’ पर बहुत कुछ लिखा हैं. वे कांगड़ा के ‘दीनानाथ कानगढ़िया’ नाम के नाक, कान के ऑपरेशन्स करने वाले वैद्य से स्वयं जाकर मिले. इन वैद्य के अनुभव डॉ. अलमस्त जी ने लिख कर रखे हैं. सन १४०४ तक की पीढ़ी की जानकारी रखने वाले ये ‘कान-गढ़िया’, नाक और कान की प्लास्टिक सर्जरी करने वाले कुशल वैद्य माने जाते हैं. ब्रिटिश शोधकर्ता सर अलेक्झांडर कनिंघम (१८१४ – १८९३) ने कांगड़ा के इस प्लास्टिक सर्जरी को बड़े विस्तार से लिखा हैं. अकबर के कार्यकाल में ‘बिधा’ नाम का वैद्य कांगड़ा में इस प्रकार के ऑपरेशन्स करता था, ऐसा फारसी इतिहासकारों ने लिख रखा हैं.

‘सुश्रुत’ की मृत्यु के लगभग ग्यारह सौ (११००) वर्षों के बाद ‘सुश्रुत संहिता’ और ‘चरक संहिता’ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ. यह कालखंड आठवी शताब्दी का हैं. ‘किताब-ई-सुसरुद’ इस नाम से सुश्रुत संहिता मध्यपूर्व में पढ़ी जाती थी. आगे जाकर, जिस प्रकार से भारत की गणित और खगोलशास्त्र जैसी विज्ञान की अन्य शाखाएं, अरबी (फारसी) के माध्यम से यूरोप पहुंची, उसी प्रकार ‘किताब-ई-सुसरुद’ के माध्यम से सुश्रुत संहिता यूरोप पहुच गई. चौदहवे – पंद्रहवे शताब्दी में इस ऑपरेशन की जानकारी अरब – पर्शिया (ईरान) – इजिप्त होते हुए इटली पहुची. इसी जानकारी के आधार पर इटली के सिसिली आयलैंड के ‘ब्रांका परिवार’ और ‘गास्परे टाग्लीया-कोसी’ ने कर्णबंध और नाक के ऑपरेशन्स करना प्रारंभ किया. किन्तु चर्च के भारी विरोध के कारण उन्हें ऑपरेशन्स बंद करना पड़े. और इसी कारण उन्नीसवी शताब्दी तक यूरोपियन्स को प्लास्टिक सर्जरी की जानकारी नहीं थी

ऋग्वेद का ‘आत्रेय (ऐतरेय) उपनिषद’ अति प्राचीन उपनिषदों में से एक हैं. इस उपनिषद में (१-१-४) ‘मां के उदर में बच्चा कैसे तैयार होता हैं’, इसका विवरण हैं. इस में कहां गया हैं की गर्भावस्था में सर्वप्रथम बच्चे के मुंह का कुछ भाग तैयार होता हैं. फिर नाक, आँख, कान, ह्रदय (दिल) आदि अंग विकसित होते हैं. आज के आधुनिक विज्ञान का सहारा लेकर, सोनोग्राफी के माध्यम से अगर हम देखते हैं, तो इसी क्रम से, इसी अवस्था से बच्चा विकसित होता हैं.

भागवत में लिखा हैं (२-१०२२ और ३-२६-५५) की मनुष्य में दिशा पहचानने की क्षमता कान के कारण होती हैं. सन १९३५ में डॉक्टर रोंस और टेट ने एक प्रयोग किया. इस प्रयोग से यह साबित हुआ की मनुष्य के कान में जो वेस्टीब्यूलर (vestibular apparatus) होता हैं, उसी से मनुष्य को दिशा पहचानना संभव होता हैं.

अब यह ज्ञान हजारों वर्ष पहले हमारे पुरखों को कहां से मिला होगा..?

संक्षेप में, प्लास्टिक सर्जरी का भारत में ढाई से तीन हजार वर्ष पूर्व से अस्तित्व था. इसके पक्के सबूत भी मिले हैं. शरीर विज्ञान का ज्ञान और शरीर के उपचार यह हमारे भारत की सदियों से विशेषतः रही हैं. लेकिन ‘पश्चिम के देशों में जो खोज हुई हैं, वही आधुनिकता हैं और हमारा पुरातन ज्ञान याने दकियानूसी हैं’, ऐसी गलत धारणाओं के कारण हम हमारे समृध्द विरासत को नकारते रहे. इसी का फायदा अंग्रेजों ने उठाया और उन्होने समृध्द ऐसी भारतीय चिकित्सा पध्दति को बदनाम और नष्ट करने के भरपूर प्रयास किए.
(…….क्रमशः)
_ ✍🏻प्रशांत पोळ
(सन्दर्भ सूची पोस्ट के दूसरे अंतिम भाग में दी गई है)

हिंदू जाति और अनुसूचित जातिके बीच का अंतर

हिंदू जाति का क्या अर्थ है ?

1) जाति का अर्थ : जाति एक बड़े पैमाने पर स्थिर एवं विशेष रूप से सामाजिक वर्ग है, जिसकी सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है और इसमें विशेष प्रथागत प्रतिबंध और विशेषाधिकार शामिल हैं।

2) हिन्दू जाति का अर्थ : हिंदू धर्म के संबंध में जाति का अर्थ है चार सामाजिक विभाजन।
I ) ब्राह्मण (पुजारी)
II ) क्षत्रिय (योद्धा)
III ) वैश्य (व्यापारी)
IV ) शूद्र (नौकर)
इन्हीं चार वर्णों में निहित जातियों को ही हिंदू जाति माना जाता हैं।

अनुसूचित जाति का क्या अर्थ है ?

1) सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 366 के खंड (24) द्वारा दिए गए अर्थ को समझाया और इसका अर्थ है ……
” ऐसी जातियों, नस्लों या जनजातियों या ऐसी जातियों, नस्लों या जनजातियों के समूहों या समूहों के रूप में जिन्हें संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति माना गया है। “

2) अनुच्छेद 341 के तहत, अनुसूचित जाति के व्यक्ति के लिए संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में निहित जातियों की सूची में से किसी एक से संबंधित होना आवश्यक है, लेकिन खंड (3) के आधार पर, यह आवश्यक नहीं है कि वह हिंदू, सिख या बौद्ध हो।

3) अनुसूचित जातियों के धर्म परिवर्तन के संबंध में मुख्य बिंदु ……
क) अनुसूचित जाति का व्यक्ति अन्य धर्म में परिवर्तित होकर भी अपनी अनुसूचित जाति का दर्जा बरकरार रखता है।

ख) अनुसूचित जाति का व्यक्ति अपने पुराने धर्म को त्याग कर नये धर्म में परिवर्तित हो जाता है, फिर भी उस व्यक्ति के जाति का कोई नुकसान नहीं होता है।

ग) अनुसूचित जाति का व्यक्ति किसी भी धर्म को मानता है, अपनी जाति को साथ लेकर चलता है।

घ) किसी दूसरे धर्म को अपनाने के बाद व्यक्ति को अपना नाम बदलना जरूरी नहीं है।

च) लेकिन किसी दूसरे धर्म को अपनाने के बाद अनुसूचित जाति के व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित है।

छ) यह स्थापित कानून है कि एक व्यक्ति अपना धर्म और आस्था बदल सकता है, लेकिन उस जाति को नहीं जिससे वह संबंधित है, क्योंकि जाति का जन्म से संबंध है।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि, अनुसूचित जातियों को किसी भी रूप में किसी भी धर्म से जोड़कर देखना मुर्खता हैं। अनुसूचित जाति केवल एक संवैधानिक वर्ग है और इसे केवल एक वर्ग के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

संदर्भ :- भारत का सर्वोच्च न्यायालय दीवानी अपील सं. 4870 – 2015.
मो. सादिक बनाम दरबार सिंह गुरु.

The Buddhist-Scheduled Caste Mission of India से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇
https://kutumbapp.page.link/CZ2gWUnFZ1redbo16
धन्यवाद!

अच्युत भोईटे, (बी कॉम एम बी ए)
संस्थापक तथा राष्ट्रीय संयोजक,
दि बुध्दिस्ट शेड्यूल कास्ट मिशन ऑफ इंडिया
मो. 9870580728.

बुराई की व्याख्या …

एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने संतोष स्वर्णकार विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में जो कुछ भी है उसे भगवान ने ही बनाया है न?

सभी ने कहा, “हां भगवान ने ही बनाया है।“

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि बुराई भी भगवान की बनाई चीज़ ही है।

प्रोफेसर ने इतना कहा तो संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर।

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि सबकुछ भगवान का ही बनाया हुआ है फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?
संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।
संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी ने पूछा , “सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?”

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है। सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं। संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।”

प्रोफेसर चुप रहे।संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी ने फिर पूछा, “सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?”

प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।” संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, “तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।” संतोष स्वर्णकार विद्यार्थी ने फिर कहा, “सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं।

सर, ठीक इसी तरह ईश्वर ने सिर्फ अच्छा-अच्छा बनाया है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। पर बुराई को ईश्वर ने नहीं बनाया। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।”

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास और ईश्वर में हमारी आस्था की कमी का नाम है। बिहार सरकार के पुर्व नलकूप चालक और सोनार समाज का पूर्व अध्यक्ष एवं राष्ट्रीय जनता दल के नगर अध्यक्ष संतोष स्वर्णकार

प्यार के नाम पर धोखाधड़ी की शिकार लड़कियां

क्या आप जानते है। बॉडी पार्ट्स आते कहाँ से है??

अगर आप के पास 5 मिनट का ‘शांत समय’ हो तो ही पढिये..

क्या आप जानते है। बॉडी पार्ट्स आते कहाँ से है??
कैसे जरूरत के हिसाब से अंगदान नही होता,
अब आप 40 लाख देकर किडनी बदलवा देते हो,

अब पैसे दिए हो तो 16-25 आयु के आसपास की मजबूत किडनी ही लगाएगा डाॅक्टर…

आखिर *बॉडीपार्ट्स कहाँ से आते है…?? मुर्दाघरो में पड़ी लाशो से या एक्सीडेंट में मरने वालो से…??

_ये पर्याप्त नही होती और 16-25 के लड़के ज्यादातर नशा करके अपने ज्यादातर पार्ट खराब कर चुके होते हैं…

एक जगह है…!! और वो है…

भारत में मिडिल क्लास फैमिली की लडकियां…!!
ये लडकियां सिगरेट, गुटखा या शराब नही यूज करती और बॉडी को मेंटेन रखती हैं…,
इनके दात, हड्डी, आँते, चमडा़, क्रेनियम, लीवर, किडनी, हृदय सब सही और ट्रांसप्लांट के लिए परफेक्ट होता है…

लव जिहाद का एक पहलू यह भी है…

इन लडकियों में “लवबग” डालकर इनको कहीं भी ले जाना आसान होता है…

लावबग का मतलब है *दिमाग मे *प्रेम-प्यार का कीड़ा*
.
इसीलिए दिसम्बर में केदारनाथ, PK जैसी लव जिहाद प्रोमोटिंग फिल्मे आती हैं..
दिसम्बर में *फ़िल्मी हीरोटाइप राज, करन, राहुल टाइप, अब्दुल, सलीम, जावेद जैसे आशिक घूमना शुरू करते हैं…

“ये बंदे कोई लवर नही बल्कि प्रोफेशनल क्रिमिनल होते हैं,,

हर साल फरवरी के अंत तक मिडिल क्लास फैमिली की 2 से 4 लाख लडकियां घर से गायब हो जाती हैं…

व्यौरा दिया जाता है कि…
आशिकी में घर से भाग गयी..,ना तो कोई केस बनता है, ना कोई खोजता है…
अंत में उनका *एक बाल तक नही मिलता…

*जरा सोचिये, *ये लडकिया कहाँ पहुँच जाती है??*

आप अच्छी तरह समझ सकते हो,

जैसे ही कोई लव जिहादी पकड़ा जाता है,
नेता और मिडिया इसमें फुदकना शुरू कर देते हैं.

असल में पहले तो *इन बच्चियों का भरपूर शारीरिक शोषण किया जाता है उसके पश्चात हत्या कर दी जाती है और अंग व्यापार से इनकी कमाई होती है..

अभी आप गूगल पर ‘ Black market price of human body parts सर्च करके अंगो के भाव देखिएगा..
फिर Organ Transplant Rate in India सर्च करके अंग प्रत्यारोपण का खर्च देखना…

“अगर एक लडकी की बॉडी को ढंग से खोले, और प्रत्यारोपण योग्य अंगों की सही कीमत लगे तो कम से कम 5 करोड़ आराम से मिल जाता है,,

इसीलिए *लव जिहाद और मानव तस्करी पर ना तो कभी कोई कानून बनता है, और ना ही कोई बनने देता है…

एक बात और :—
कभी भी किसी नेता या बिजनेसमेन की बेटी घर से नही भागती/गायब होती है…

हमेशा वही लडकिया गायब होती हैं, जिनके परिवार की कोई राजनितिक या क़ानूनी Approach/पकड़ नही होती..

2015 में UP से 4000 लडकिया गायब हुई थी, केवल ह्यूमन ट्रैफिकिंग से बचने के लिए ही Anti-Romio Squad बनाया गया था,

जिसका नेताओ, मिडिया और बिना दिमाग वालों ने भरपूर विरोध किया था,,

माना कि हमारी लाड़ली बहिन बेटियां सब जानती हैं,

लेकिन क्रिमिनल मार्केटिंग और अंग प्रत्यारोपण के लिए *सही और असली अंग आते कहाँ से हैं..

ये नही जानती,,

अपनी बहिन बेटियों का ध्यान दें, क्योंकि,
*जो बाहर हो रहा है, वो हमारे घर में कभी भी हो सकता है..
कृपया, पढ़कर अपने संपर्क में सभी को शेयर कीजिये जिससे *किसी की बहन-बेटी इस तरह के षड़यंत्र का शिकार ना हो!

ध्यान रहे कि यत्र नार्यास्तु पुजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता: का श्लोक केवल हिन्दुओं पर लागू होता है, गैर हिन्दुओं पर नहीं.
मेरा अभिप्राय आप भलीभांति समझ गए होंगे..

घर में, दोस्तों में, चर्चा करने मेँ शर्माएं नहीं
हमारी तथाकथित बेशर्मी किसी परिवार की इज्जत और बहिन-बेटी की अनमोल जान बचा सकेगी

आइये हम अपना नैतिक दायित्व निभाएं!

( बच्चियों को छूट तो दे-लेकिन खतरों से भी आगाह करे)

Design a site like this with WordPress.com
Get started